हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल के घोनारबन क्षेत्र में ‘इमाम महदी अलैहिस्सलाम और मरजइयत’ के विषय पर यह विद्वतापूर्ण और प्रचारात्मक बैठक आयोजित की गई। इसमें 15 से अधिक उलमा-ए-कराम और लगभग 150 से 200 मोमिनों ने भाग लिया, जबकि युवाओं की भी बड़ी संख्या मौजूद थी।
इस कार्यक्रम का आयोजन भारत में आयतुल्लाह शेख़ मुहम्मद याक़ूबी के कार्यालय की ओर से आलिया अकादमी के सहयोग और निगरानी में किया गया। कार्यक्रम में ग़ैबत के दौर में मरजइयत की आवश्यकता, धार्मिक मार्गदर्शन में इसकी भूमिका तथा मोमिनों और युवाओं के मरजइयत से मजबूत संबंध के महत्व पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम की शुरुआत पवित्र क़ुरआन की तिलावत से हुई, जिसका सौभाग्य शेख़ अरशद अली क़ुम्मी को प्राप्त हुआ। इसके बाद हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शेख़ जमशीद अली क़ुम्मी ने ग़ैबत-ए-कुबरा के दौर में मरजइयत की आवश्यकता और उसके लाभों के विषय पर भाषण दिया। उन्होंने धार्मिक विद्वानों और विश्वसनीय रावियों की ओर रुख करने के महत्व को स्पष्ट किया।
इस अवसर पर अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम के शायर मीज़ान ग़ाज़ी ने अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम और इमाम महदी अलैहिस्सलाम की प्रशंसा में अशआर प्रस्तुत किए। वहीं हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद क़ायद अब्बास रिज़वी ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शान में काव्यात्मक श्रद्धांजलि प्रस्तुत की।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शेख़ मक़बूल हुसैन क़ुम्मी, अमीने मजलिस-ए-उलमा-ए-मगरिबी बंगाल ने मरजइयत की आवश्यकता और महत्व पर भाषण दिया। उन्होंने आयतुल्लाह शेख़ मुहम्मद याक़ूबी की ओर से पश्चिम बंगाल के मोमिनों और युवाओं पर विशेष ध्यान देने तथा उनकी धार्मिक और बौद्धिक मार्गदर्शन के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने के प्रयासों का उल्लेख किया।
मौलाना शेख़ असग़र अली ग़ायन ने मरजइयत से जुड़ाव के लाभ और उससे दूरी के नुकसानों पर चर्चा करते हुए मोमिनों से अपने धार्मिक मामलों में विश्वसनीय मरजाओं की ओर रुख करने की ताकीद की।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद फ़िरोज़ हुसैन ज़ैदी ने वर्तमान दौर में शैक्षिक, धार्मिक और बौद्धिक कार्यक्रमों की आवश्यकता तथा मोमिनों और मरजइयत के बीच मजबूत संबंध के महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं मरजइयत के प्रतिनिधि शेख़ मासूम अली ने ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के उद्देश्यों और विशेष रूप से युवाओं की धार्मिक एवं बौद्धिक तरबीयत में उनकी भूमिका और महत्व को स्पष्ट किया।
कार्यक्रम के अंत में भारत स्थित कार्यालय की ओर से आयतुल्लाह शेख़ मुहम्मद याक़ूबी के चित्रों वाले फ्रेम कार्यक्रम में शामिल छह हैअतों को उपहार के रूप में दिए गए। कार्यक्रम दुआ और तज़ऱ्रु के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में तबर्क के रूप में बिरयानी भी वितरित की गई।
कार्यक्रम में शामिल उलमा-ए-कराम और युवाओं ने भविष्य में भी ऐसे शैक्षिक, बौद्धिक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की, ताकि मोमिनों, विशेष रूप से युवा पीढ़ी को दौर-ए-ग़ैबत में मरजइयत के महत्व और आवश्यकता के बारे में और अधिक जागरूक किया जा सके।








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