हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मजलिस ए रिबात मोहम्मदी इराक के प्रवक्ता शेख़ कामिल फहदावी ने “मजमा-ए-जहानी क़ादिमून” के तत्वावधान में आयोजित तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “बेसत-ए-उम्मते मोहम्मद” को संबोधित करते हुए इस्लामी जगत की मौजूदा संवेदनशील स्थिति की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि उम्मते-मुस्लिमा आज एक निर्णायक दौर से गुजर रही है, जिसमें उसके अस्तित्व, इतिहास, धर्म और संसाधनों को निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने ग़ाज़ा में बड़े पैमाने पर हुई तबाही और अरब व इस्लामी देशों तथा फ़िलिस्तीन के समर्थकों के खिलाफ़ किए जा रहे हमलों का उल्लेख करते हुए कहा कि फ़िलिस्तीन का मुद्दा उम्मत ए मुस्लिमा का केंद्रीय मुद्दा है और पूरी उम्मत को इसके साथ खड़ा होना चाहिए, क्योंकि फ़िलिस्तीन का विनाश पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।
शेख़ कामिल फहदावी ने ग़ाज़ा की स्थिति को उम्मते-मुस्लिमा के लिए ख़तरे की घंटी बताते हुए कहा कि अगर उम्मत फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर लापरवाही बरतेगी तो आज ग़ाज़ा पर थोपा जा रहा अंजाम क्षेत्र के दूसरे देशों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। उन्होंने लेबनान इस्लामी गणराज्य ईरान, यमन और प्रतिरोध का समर्थन करने वाले अन्य पक्षों के खिलाफ़ हुए हमलों का भी उल्लेख किया।
मजलिस-ए-रिबात मोहम्मदी इराक के प्रवक्ता ने ग़ज़ा, दक्षिणी लेबनान के लोगों, प्रतिरोधी बलों और क्षेत्र के अन्य देशों में हमलों के पीड़ितों की शहादत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पवित्र ख़ून उम्मत ए मुस्लिमा को सम्मान, गौरव और आक्रामकता के खिलाफ़ प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करे, क्योंकि किसी एक अरब या इस्लामी देश पर हमला वास्तव में पूरी उम्मत पर हमला है।
उन्होंने कहा कि ग़ाज़ा की घटनाओं के कारण यूरोप और अमेरिका के कुछ हिस्सों में फ़िलिस्तीन और ज़ायोनी शासन को लेकर जनमत में बदलाव आया है। इस बदलाव को फ़िलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन के रास्ते में महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
शेख़ कामिल फहदावी ने हज के दौरान मुसलमानों के विशाल जमावड़े का उल्लेख करते हुए इसे उम्मत ए मुस्लिमा की एकता की क्षमता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि लाखों मुसलमान एक स्थान पर एकत्र होते हैं और इस विशाल जमावड़े में धार्मिक एवं राष्ट्रीय मतभेद कम हो जाते हैं। ऐसे बड़े धार्मिक सम्मेलनों में भी फ़िलिस्तीन के मुद्दे को गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।
उन्होंने ग़ाज़ा संकट के सामने उम्मत ए मुस्लिमा की ख़ामोशी और आपसी मतभेदों पर चिंता व्यक्त करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की हदीस का हवाला दिया,मोमिन आपस में प्रेम, दया और सहानुभूति में एक शरीर के समान हैं।
उन्होंने कहा कि उम्मत ए मुस्लिमा को अपने शरीर के किसी एक हिस्से की तकलीफ़ से बेपरवाह नहीं रहना चाहिए। आज अगर उलमा, बुद्धिजीवी और प्रचारक उम्मत के विद्वानों और प्रमुख लोगों को एक साझा मौकिफ पर एकजुट करने के लिए इसी तरह प्रयास नहीं करेंगे, तो याद रखना चाहिए कि इस्लामी जगत को भविष्य में और भी बड़े ख़तरों का सामना करना पड़ सकता है।
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