हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , यूरोप के मुस्लिम संघ के अध्यक्ष अब्दुलवाहिद नियाज़ोफ़ ने कहा कि इस्लामी उम्मत में आज होने वाले बदलावों, विशेष रूप से ईरान की जनता के प्रतिरोध और ग़ाज़ा के लोगों के दृढ़ संकल्प ने मुसलमानों के बीच एकता और आपसी तालमेल के नए रास्ते खोले हैं।
पैग़ंबर मोहम्मद (स.अ.) की उम्मत के चौथे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन «बेअसते उम्मते मोहम्मदी» को संबोधित करते हुए अब्दुलवाहिद नियाज़ोफ़ ने इस्लामी दुनिया की एकता की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि आज इस्लामी उम्मत बड़े बदलावों के दौर से गुज़र रही है, जिनका प्रभाव न केवल इस्लामी दुनिया, बल्कि वैश्विक व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। ईरानी राष्ट्र का साहस और दृढ़ता इन बदलावों के महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई से जोड़े गए एक कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “इस्लाम महत्वपूर्ण है” का विचार सभी मुसलमानों के लिए प्रेरणा बन सकता है, चाहे उनकी राष्ट्रीयता, भौगोलिक क्षेत्र या धार्मिक विचारधारा कुछ भी हो। उन्होंने कहा कि मानवता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए इस्लाम की रक्षा करना तथा इस्लामी उम्मत की एकता को मज़बूत बनाना आवश्यक है।
यूरोप के मुस्लिम संघ के अध्यक्ष ने आगे कहा कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच हालिया युद्ध के बाद पैदा हुए हालात ने इस्लामी उम्मत के बीच अधिक एकता और एकजुटता की नई संभावनाएँ पैदा की हैं। उन्होंने प्रतिरोध की धुरी में ईरान, यमन, इराक और लेबनान के कुछ हिस्सों का उल्लेख किया। इसके साथ ही उन्होंने मक्का समझौते से जुड़ी प्रक्रियाओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुस्लिम देशों में आपसी सहयोग और एकजुटता की दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता मौजूद है।
कुछ अरब और इस्लामी देशों द्वारा इज़राइली शासन का साथ देने की आलोचना करते हुए नियाज़ोफ़ ने कहा कि आज इस्लामी उम्मत को पहले से कहीं अधिक एकता की आवश्यकता है। मौजूदा परिस्थितियों का उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए कि सभी इस्लामी देश आपसी एकजुटता और भाईचारे के रास्ते पर लौट सकें।
ग़ाज़ा युद्ध की तीसरी बरसी और 7 अक्टूबर की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “ग़ाज़ा ने दुनिया को जगा दिया है। अब ग़ाज़ा को इस्लामी उम्मत को भी उठ खड़े होने, अपनी वास्तविक स्थिति को पहचानने और उस ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जो अल्लाह ने उस पर डाली है।
उन्होंने फ़िलिस्तीनी जनता और मस्जिदुल-अक्सा के समर्थन पर ज़ोर देते हुए कहा कि मुसलमानों को हर उस स्थान पर अपने भाइयों के साथ खड़ा होना चाहिए, जहाँ वे दबाव और अन्याय का सामना कर रहे हैं। इनमें फ़िलिस्तीन, सूडान और कश्मीर विशेष रूप से शामिल हैं।
ग़ाज़ा के लोगों के तीन वर्षों के दुख-दर्द का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ के लोगों ने अपना हौसला नहीं खोया है। उनका ईमान और दृढ़ संकल्प दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले मुसलमानों, विशेष रूप से यूरोपीय देशों के मुसलमानों को प्रभावित कर रहा है।
अंत में अब्दुलवाहिद नियाज़ोफ़ ने कहा कि इस्लामी उम्मत केवल एकता के माध्यम से ही अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकती है और दुनिया में अपना उचित स्थान दोबारा हासिल कर सकती है।
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