हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ में आयोजित 23वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले में विभिन्न विषयों पर प्रकाशित पुस्तकों के साथ शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई के जीवन, विचारों और संघर्ष पर आधारित पुस्तकों ने भी पाठकों और विद्वानों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। विलायत फाउंडेशन और कौसर पब्लिकेशंस के संयुक्त स्टॉल पर प्रदर्शित पुस्तकों में विशेष रूप से ‘250 साल का इंसान’ उल्लेखनीय रही, जो उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उपलब्ध थी।
पुस्तक मेले में लोगों की रुचि और पुस्तकों के अध्ययन के प्रति उनका रुझान इस बात को दर्शाता है कि आज भी समाज में अध्ययन, ज्ञान, साहित्य और बौद्धिक विरासत के प्रति लगाव बना हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ के बलरामपुर गार्डन में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में देश के विभिन्न प्रकाशन संस्थानों ने अपनी पुस्तकें प्रस्तुत कीं। इस अवसर पर विलायत फाउंडेशन और कौसर पब्लिकेशंस के स्टॉल पर धार्मिक, वैचारिक, ऐतिहासिक और इस्लामी विषयों पर आधारित पुस्तकों ने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। स्टॉल पर बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए विभिन्न विषयों की पुस्तकें उपलब्ध थीं।
‘250 साल का इंसान’ विशेष आकर्षण का केंद्र
स्टॉल पर शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई की पुस्तकों में ‘250 साल का इंसान’ को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। इस पुस्तक में अहले बैत (अ) के इमामों के जीवन को अलग-अलग घटनाओं के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय एक निरंतर संघर्ष के विभिन्न चरणों के रूप में समझाया गया है। इस संघर्ष का मूल उद्देश्य इस्लामी समाज का निर्माण और इस्लामी शिक्षाओं का पुनर्जीवन बताया गया है। पुस्तक के उर्दू और अंग्रेज़ी संस्करण उपलब्ध होने से विभिन्न भाषाओं के पाठक इसकी ओर आकर्षित हुए।
इसके अतिरिक्त ‘सेल नंबर 14’ और ‘ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन’ जैसी पुस्तकों ने भी पाठकों की रुचि आकर्षित की। इन रचनाओं में कारावास के अनुभवों, दृढ़ता, आशा और वैचारिक स्वतंत्रता जैसे विषयों को स्थान दिया गया है।
स्टॉल पर उपलब्ध अन्य प्रमुख पुस्तकों में ‘तालीम-ए-अहकाम’, ‘फ़िलिस्तीन’ और ‘सादिक़े आले मुहम्मद (अ)’ शामिल थीं। ‘तालीम-ए-अहकाम’ में दैनिक जीवन से संबंधित धार्मिक नियमों और शरई मसलों को सरल भाषा में समझाया गया है। वहीं, ‘फ़िलिस्तीन’ में फ़िलिस्तीन समस्या के इतिहास और इस संबंध में शहीद रहबर-ए-इंकलाब के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। ‘सादिक़े आले मुहम्मद (अ)’ में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के जीवन, उनकी शैक्षणिक एवं धार्मिक सेवाओं और उस दौर की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का परिचय दिया गया है।
उर्दू पुस्तकों की स्थिति पर आदिल फ़राज़ ने जताई चिंता
प्रसिद्ध लेखक आदिल फ़राज़ ने पुस्तक मेले में उर्दू पुस्तकों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बलरामपुर गार्डन में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेला उर्दू के लिहाज़ से बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं है। हालांकि, विलायत फाउंडेशन, मजलिस तहक़ीक़ात व नश्रियात-ए-इस्लामी, उर्दू अकादमी लखनऊ और रेख़्ता की मौजूदगी अंधेरे में रोशनी की तरह है।
उन्होंने कहा कि विलायत फाउंडेशन और कौसर पब्लिकेशंस धार्मिक साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपनी पुस्तकों के प्रचार के लिए आधुनिक माध्यमों को अपनाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, स्टॉल पर बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए पुस्तकें उपलब्ध थीं। विशेष रूप से शहीद रहबर-ए-इंकलाब की पुस्तकों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
आदिल फ़राज़ ने उर्दू अकादमी के संदर्भ में नई पुस्तकों के प्रकाशन की कमी की ओर भी ध्यान दिलाया। वहीं, रेख़्ता फाउंडेशन की उर्दू साहित्य के लिए सेवाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उसकी गतिविधियों में हिंदी के प्रचार-प्रसार पर भी अधिक ध्यान दिखाई दिया।
उन्होंने उर्दू की शैक्षणिक और साहित्यिक विरासत के संरक्षण तथा विकास पर ज़ोर देते हुए कहा कि लखनऊ जैसे ज्ञान और साहित्य के लिए प्रसिद्ध शहर में पुस्तक मेले के दौरान उर्दू के स्टॉलों पर सन्नाटा दिखाई देना चिंता का विषय है। उनके अनुसार, हमें अपनी बौद्धिक और साहित्यिक विरासत के संरक्षण एवं विकास के लिए जागरूक होना चाहिए।
पुस्तक मेले में विलायत फाउंडेशन और कौसर पब्लिकेशंस की भागीदारी ने धार्मिक एवं वैचारिक साहित्य के प्रचार-प्रसार के साथ इस आवश्यकता को भी उजागर किया कि गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाने के लिए आधुनिक प्रचार माध्यमों को अपनाया जाए और नई पीढ़ी में अध्ययन की रुचि विकसित की जाए।
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