हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ग़ज़्ज़ा के उन खंडहरों में, जहां युद्ध के कारण शैक्षणिक संस्थान बंद हो गए हैं, एक शिक्षक बिना किसी विशेष साधन के, लेकिन उम्मीद से भरे दिल के साथ बच्चों के मन में भविष्य के बीज बो रहा है। ये बच्चे आज भी एक उज्ज्वल कल के निर्माण का सपना देखते हैं।
अरब मीडिया कर्मी राएद मूसा की एक रिपोर्ट पर आधारित इस वृत्तांत में युद्ध की तबाही के बीच ग़ज़्ज़ा के बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए एक फिलिस्तीनी शिक्षक के प्रयासों को बयान किया गया है।
ग़ज़्ज़ा में युद्ध ने अनेक स्कूलों को तबाह कर दिया है, लेकिन आज भी ऐसे शिक्षक मौजूद हैं, जो शिक्षा की लौ बुझने नहीं देना चाहते।
फिलिस्तीनी शिक्षक महमूद हम्द तमाम कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाने के अपने संकल्प पर कायम हैं। वह अपने विद्यार्थियों को खुले मैदानों, पेड़ों की छाया और तबाह हो चुके स्कूलों के आंगनों में इकट्ठा करते हैं, ताकि बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।
यहां न आधुनिक सुविधाओं से लैस कक्षाएं हैं और न ही स्कूलों की सामान्य सुविधाएं। इसके बावजूद शिक्षक बच्चों को यह सिखाने के लिए मौजूद हैं कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर भविष्य के बारे में सोचा जा सकता है।
इस साधारण-सी कक्षा को प्रभावशाली और दिलचस्प बनाने वाली सबसे बड़ी चीज़ उन बच्चों के सपने हैं, जो खंडहरों के बीच जीवन बिताने के बावजूद अपने उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद लगाए हुए हैं।
सात वर्षीय छात्र मोतासिम इंजीनियर बनना चाहता है, ताकि ग़ज़ा के तबाह हो चुके कारखानों का दोबारा निर्माण कर सके।
समा डॉक्टर बनने की इच्छा रखती है, ताकि घायलों की मदद कर सके। वहीं, नौ वर्षीय जूद शिक्षिका बनना चाहती है, ताकि एक दिन वह स्वयं दूसरे बच्चों को शिक्षा दे सके।
इन बच्चों को शैक्षणिक सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से अनेक बच्चे अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दिन देख चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने सपनों से मुंह नहीं मोड़ा है।
इनके लिए शिक्षा केवल कुछ शब्द और अंक सीखने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक बेहतर भविष्य तक पहुंचने का रास्ता है।
महमूद हम्द खंडहरों के बीच कक्षाएं आयोजित करके यह साबित कर रहे हैं कि शिक्षा को केवल दीवारों और इमारतों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
हो सकता है कि आज ये बच्चे स्कूलों की सामान्य कक्षाओं में बैठकर पढ़ाई नहीं कर पा रहे हों, लेकिन वे अब भी अस्पतालों, स्कूलों और कारखानों के पुनर्निर्माण के सपने देख सकते हैं।
ग़ज़्ज़ा में स्कूल तबाह हो गए हैं, लेकिन बच्चों के सपने अब भी जीवित हैं। वहां आज भी ऐसे शिक्षक मौजूद हैं, जो उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद को मलबे के नीचे दबने नहीं देते।
आपकी टिप्पणी