हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | अल्लाह तआला पवित्र क़ुरआन में फ़रमाता है:
«وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْیَةِ الَّتِی کَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ یَعْدُونَ فِی السَّبْتِ إِذْ تَأْتِیهِمْ حِیتَانُهُمْ یَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَیَوْمَ لَا یَسْبِتُونَ لَا تَأْتِیهِمْ کَذَٰلِکَ نَبْلُوهُمْ بِمَا کَانُوا یَفْسُقُونَ.»
और उनसे उस बस्ती के बारे में पूछिए, जो समुद्र के किनारे बसी हुई थी। जब वहाँ के लोग शनिवार के दिन अल्लाह के आदेश का उल्लंघन करते थे। उस दिन उनकी मछलियाँ पानी की सतह पर खुले तौर पर उनके पास आ जाती थीं, जबकि जिन दिनों वे शनिवार का पालन नहीं करते थे, उन दिनों मछलियाँ उनके पास नहीं आती थीं। इस तरह हम उन्हें उनकी अवज्ञा के कारण परीक्षा में डालते थे। (सूर ए आराफ़, आयत 163)
व्याख्या:
ईश्वरीय परीक्षा का एक अत्यंत गहरा पहलू यह है कि इंसान की परीक्षा हमेशा अभाव और इच्छाओं से दूर रहने की स्थिति में नहीं होती, बल्कि कभी-कभी ठीक उस समय होती है, जब उसकी इच्छाएँ उसके सामने होती हैं और उन्हें हासिल करने का प्रलोभन अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है।
कभी ऐसा होता है कि अल्लाह किसी चीज़ को इंसान से दूर नहीं रखता, ताकि वह उसकी चाहत में तड़पता रहे, बल्कि उस चीज़ को उसकी आँखों के सामने, बिल्कुल करीब और आसानी से हासिल होने वाली स्थिति में रख देता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या उसमें अल्लाह के आदेश के सामने अपने आप पर नियंत्रण रखने की शक्ति है या वह अपनी इच्छाओं का बंदी बन जाता है।
अस्हाब-ए-सब्त (शनिवार के दिन उल्लंघन करने वाले लोगों) के क़िस्से में मछलियाँ ठीक उसी दिन बड़ी संख्या में और स्पष्ट रूप से किनारे की ओर आती थीं, जिस दिन उनका शिकार करना हराम था। क़ुरआन में इसके लिए कहा गया है: «تَأْتِیهِمْ حِیتَانُهُمْ» (उनकी मछलियाँ उनके पास आती थीं)।
इसी तरह सूरह अल-माइदा की आयत 94 में भी अल्लाह ने शिकार के माध्यम से ईमान वालों की परीक्षा लेने का उल्लेख किया है। यह ऐसा शिकार था, जो उनके हाथों और भालों की पहुँच में था।
«یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا لَیَبْلُوَنَّکُمُ اللَّهُ بِشَیْءٍ مِنَ الصَّیْدِ تَنَالُهُ أَیْدِیکُمْ وَرِمَاحُکُمْ لِیَعْلَمَ اللَّهُ مَنْ یَخَافُهُ بِالْغَیْبِ فَمَنِ اعْتَدَیٰ بَعْدَ ذَٰلِکَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِیمٌ.»
ऐ ईमान वालो! अल्लाह तुम्हें ऐसे शिकार के ज़रिये अवश्य आज़माएगा, जो तुम्हारे हाथों और भालों की पहुँच में होगा, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि कौन बिना देखे अल्लाह से डरता है। इसके बाद भी जो कोई हद से आगे बढ़ेगा, उसके लिए दर्दनाक अज़ाब है।
ये आयतें एक बड़ी सच्चाई को उजागर करती हैं: इंसान की बंदगी का वास्तविक मूल्य उस समय सामने आता है, जब वह अपने दिल की इच्छा और अल्लाह के आदेश के बीच खड़ा होता है।
यदि कोई चीज़ इंसान की पहुँच से बाहर हो और उसे हासिल करने की संभावना भी न हो, तो उससे दूरी बनाए रखना बहुत कठिन नहीं होता। लेकिन बंदगी की असली खूबी वहाँ सामने आती है, जहाँ इंसान के पास कोई काम करने की क्षमता भी हो, अवसर भी उपलब्ध हो और उसके सामने कोई प्रत्यक्ष बाधा भी न हो, फिर भी वह केवल ईमान और अल्लाह की आज्ञा का पालन करते हुए स्वयं को रोक ले।
हो सकता है कि हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षाएँ भी इसी तरह की हों: ऐसा धन जिसे गलत रास्ते से आसानी से हासिल किया जा सकता हो, ऐसा पद जिसका दुरुपयोग किया जा सकता हो, ऐसा रिश्ता जिसमें ईश्वरीय सीमाओं का उल्लंघन किया जा सकता हो या ऐसा अवसर जिसे दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करके प्राप्त किया जा सकता हो।
शायद ईमान की सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति यही है कि इंसान अपनी इच्छाओं के चरम पर भी अल्लाह को न भूले और ठीक उस समय, जब उसका हाथ अपनी चाहत तक पहुँचने वाला हो, उसे याद रहे कि अल्लाह की प्रसन्नता हर उस चीज़ से अधिक मूल्यवान है, जिसे वह हासिल कर सकता है।
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