शनिवार 26 सितंबर 2026 - 08:12
ईमान;दिल के विश्वास, ज़बान के इकरार और अमल की सच्चाई का नाम है।हुज्जतुल इस्लाम मौलाना इमरान अहमद

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम मौलाना इमरान अहमद ने जुमआ के ख़ुत्बे में ईमान की अहमियत बयान करते हुए कहा कि ईमान केवल ज़बान से इकरार का नाम नहीं, बल्कि दिल के विश्वास, ज़बान से इज़हार और अंगों से नेक अमल का नाम है। उन्होंने कहा कि तवक्कुल, तफ़वीज़, रज़ा और तस्लीम ईमान के महत्वपूर्ण रुक्न हैं, जिनके ज़रिए इंसान मुश्किल हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखते हुए साबित क़दम रहता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना इमरान अहमद ने जुमआ के खुत्बे में ईमान की अहमियत को बयां करते हुए कहा, अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ...»
यानी, “ऐ ईमान वालों! अल्लाह, उसके रसूल और उस किताब पर ईमान लाओ जो उसने अपने रसूल पर नाज़िल की है।इस आयत में इंसान को ईमान की गहराई और उसकी मज़बूती की तरफ़ बुलाया गया है। ईमान केवल एक नाम या ज़बान से किया हुआ दावा नहीं, बल्कि इंसान के दिल और उसकी पूरी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ मामला है। जिस दिल में अल्लाह की पहचान और उसके रसूल व अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की मोहब्बत पैदा हो जाती है, उसके विचार, व्यवहार और अमल में भी उसका असर दिखाई देना चाहिए।

रसूले ख़ुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम का फ़रमान है: «الایمان عقد بالقلب و نطق باللسان و عمل بالاركان»

यानी ईमान दिल के अक़ीदे, ज़बान से इज़हार और अंगों से अमल का नाम है। इस हदीस में ईमान की पूरी तस्वीर हमारे सामने आ जाती है। दिल में यक़ीन हो, ज़बान से उसका इज़हार हो और इंसान के अमल से भी उसके ईमान की गवाही मिले। अगर कोई व्यक्ति ज़बान से ईमान का दावा करे, लेकिन उसके व्यवहार में झूठ, धोखा, ज़ुल्म, बदअख़लाक़ी और हराम काम दिखाई दें, तो उसे अपने ईमान का जायज़ा लेना चाहिए। सच्चा ईमान इंसान को केवल मस्जिद और इबादतगाह तक नहीं ले जाता, बल्कि उसके घर, कारोबार, रिश्तों और सामाजिक व्यवहार को भी बेहतर बनाता है।

मोमिनों के ईमानी दर्जों में बहुत अंतर होता है। हर व्यक्ति का ईमान एक ही स्तर का नहीं होता। किसी का ईमान कमज़ोर होता है और किसी का ईमान इतना मजबूत होता है कि वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अल्लाह पर भरोसा बनाए रखता है। तवक्कुल, तफ़वीज़, रज़ा और तस्लीम ईमान के महत्वपूर्ण रुक्न हैं।

तवक्कुल यह है कि इंसान अपनी पूरी कोशिश करने के बाद अल्लाह पर भरोसा करे। तफ़वीज़ यह है कि अपने मामलों को अल्लाह के हवाले कर दे। रज़ा का मतलब अल्लाह के फ़ैसले पर दिल से राज़ी रहना है और तस्लीम का अर्थ उसके हुक्म के सामने सिर झुका देना है। जिस व्यक्ति में ये गुण पैदा हो जाते हैं, उसका दिल सुकून हासिल करता है और उसका ईमान स्थिर एवं मज़बूत होता है।

इंसान के ईमान की असली परीक्षा आराम के दिनों में नहीं, बल्कि मुश्किल और इम्तिहान के समय होती है। जब बीमारी, परेशानी, आर्थिक कठिनाई, पारिवारिक समस्या या कोई दूसरी आज़माइश सामने आती है, तब पता चलता है कि हमारा भरोसा कितना मजबूत है।

कमज़ोर अक़ीदे वाले लोग अक्सर केवल ज़बान से ईमान का दावा करते हैं, लेकिन इम्तिहान आने पर घबरा जाते हैं, मायूसी का शिकार हो जाते हैं और कभी ऐसे शब्द भी कह देते हैं जो उनके ईमान के लिए नुकसानदेह होती हैं। इसके विपरीत सच्चा मेमिन मुसीबत में सब्र करता है, अल्लाह से उम्मीद रखता है और यह यक़ीन बनाए रखता है कि अल्लाह की हिकमत इंसान की समझ से कहीं बड़ी है।

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से मंसूब है कि अल्लाह दुनिया अपने दोस्त को भी देता है और अपने दुश्मन को भी, लेकिन ईमान अपने चुने हुए बंदों को प्रदान करता है। इसलिए हमें दुनिया की दौलत, शोहरत, पद और कामयाबी को ईमान की निशानी नहीं समझना चाहिए। असली कामयाबी यह है कि इंसान के दिल में अल्लाह का यक़ीन हो, उसकी ज़बान सच्चाई बोलती हो और उसके हाथ-पैर नेक कामों में इस्तेमाल हों। हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि हमारी नमाज़ हमारे अख़लाक़ को कितना बेहतर बना रही है? हमारा रोज़ा हमें गुनाह से कितना रोक रहा है? अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से हमारी मोहब्बत हमारे व्यवहार में कितनी दिखाई देती है? यही सवाल हमारे ईमान की वास्तविक स्थिति को समझने में मदद करती हैं।

इतिहास में ऐसे सच्चे अहले-ईमान बहुत कम दिखाई देते हैं जिनका वज़ीर सब्र और बरदाश्त हो और जिनका अमीर-ए-लश्कर अक़्ल हो। जब ग़ुस्सा इंसान का नेतृत्व करने लगे तो वह सही और गलत का अंतर भूल सकता है। जब हवस और लालच इंसान पर हावी हो जाए तो वह अपने ईमान के तकाज़ों को पीछे छोड़ देता है। लेकिन जिस इंसान के फैसलों में अक़्ल, सब्र, तक़वा और अल्लाह पर भरोसा शामिल हो जाए, उसका ईमान उसके चरित्र को मजबूत कर देता है। इसलिए हमें अपनी नई नस्ल की तरबियत भी ईमान की इसी समझ के साथ करनी चाहिए, ताकि वे केवल ईमान का नाम लेने वाले न हों, बल्कि ईमान को अपने चरित्र, व्यवहार और जीवन में उतारने वाले बनें।

आख़िर में आइए हम सब अपने दिलों का जायज़ा लें और यह अहद करें कि ईमान को केवल ज़बान का दावा नहीं रहने देंगे। हम अल्लाह पर तवक्कुल करेंगे, उसके फ़ैसले पर रज़ा और तस्लीम का रास्ता अपनाएँगे, मुसीबत में सब्र करेंगे और नेमत मिलने पर शुक्र अदा करेंगे। अपनी ज़बान को झूठ, ग़ीबत और बुरी बातों से बचाएँगे तथा अपने अंगों को हराम कामों से दूर रखेंगे। अल्लाह तआला हमें ऐसा पुख़्ता ईमान अता फ़रमाए जो इम्तिहान के समय डगमगाए नहीं, मुसीबत में मायूस न हो, नेमत में घमंड न करे और हर हाल में हक़ और इंसाफ़ का साथ दे। परवरदिगार हमें क़ुरआन, रसूले ख़ुदा और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन या रब्बल आलमीन।

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