मशहद में हरम इमाम रज़ा (अलैहिस्सलाम) में हर रात अपने पिता के साथ हाज़िरी देने वाले एक बच्चे ने एक शाम पिता को यह ख़ुशख़बरी सुनाई कि अब ज़ियारत-ए-जामे'आ (कबीरा) मुझे ज़बानी याद है। पिता मुस्कराए,…
हौज़ा/ बचपन के हर स्टेज की अपनी खासियत होती है; शुरुआती सालों में माता-पिता से गहरा लगाव होता है, जबकि करीब नौ साल की उम्र में कलेक्टिव चेतना का बनना और ज़िम्मेदारी का महत्व साफ़ होने लगता है।