शुक्रवार 8 मई 2026 - 15:05
शहीद इमाम ख़ामेनेई की ज़बानी: बचपन का वह क़िस्सा जब पहली बार ज़ियारत-ए-जामेआ याद की

मशहद में हरम इमाम रज़ा (अलैहिस्सलाम) में हर रात अपने पिता के साथ हाज़िरी देने वाले एक बच्चे ने एक शाम पिता को यह ख़ुशख़बरी सुनाई कि अब ज़ियारत-ए-जामे'आ (कबीरा) मुझे ज़बानी याद है। पिता मुस्कराए, बेटे को सीने से लगाया और कहा: बारकल्लाह।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार | आयतुल्लाह शहीद सैयद अली ख़ामेनेई, जिनका ज़िक्र आज भी इल्म और तक़्वा की रौशन मिसाल के रूप में किया जाता है, उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के बारे में एक वाक़या ख़ुद बयान किया है जो उनके बचपन की रूहानी तर्बियत और पिता के साथ गहरे ताल्लुक़ को ज़ाहिर करता है। यह वाक़या न केवल ज़ियारात के हवाले से अहम है, बल्कि वालिदैन की औलाद की तर्बियत में मुहब्बत व शफ़क़त के किरदार को भी उजागर करता है।

शहीद सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ख़ुद बयान करते हैं:

"मेरे पिता (आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई) हर रात मगरिब और इशा की नमाज़ के बाद इमाम रज़ा (अ) की दरगाह की ओर रवाना होते थे। वे तक़रीबन कोई रात ज़ियारत नहीं छोड़ते थे। मैं भी हर रात उनके साथ हरम जाया करता था।

जब हम हरम पहुँचते, तो पिता श्री ज़ियारत-ए-अमीनुल्लाह पढ़ते और ज़ियारत-ए-जामेआ-ए-कबीरा को बार-बार पढ़ते। इस वजह से उनकी ज़ियारत काफ़ी लंबी हो जाती थी। मैं बच्चा था, लेकिन वहीं बैठकर मफ़ातीहुल जिनान से ज़ियारत-ए-जामेआ पढ़ता रहता था।"

शहीद नेता ने बताया कि इतनी बार पढ़ने के नतीजे में यह लंबी और अहम ज़ियारत मुझे ज़बानी याद हो गई। एक रात जब हम हरम से बाहर निकले, तो मैंने वालिद से कहा: "बाबा जान! मैंने आज रात ज़ियारत-ए-जामे'आ पूरी ज़बानी याद कर ली है।"

यह सुनते ही वालिद साहिब के चेहरे पर ख़ुशी और मुस्कराहट फैल गई। उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया, सिर पर हाथ फेरा और फ़रमाया: "बारकल्लाह"।

इस वाक़िए से कई सबक मिलते हैं। अव्वल यह कि बच्चों को छोटी उम्र से ही दीनी माहौल और हरम की ज़ियारत की आदत डलवानी चाहिए। दोयम यह कि बार-बार पढ़ने से बड़ी से बड़ी दुआएँ और ज़ियारतें याद हो सकती हैं। सोयम यह कि जब बच्चा कोई दीनी काम करे, तो वालिदैन को उसे फ़ौरन सराहना और दुआ देनी चाहिए — जैसा कि शहीद के वालिद ने किया।

यह तहरीर "शहीद ख़ामेनेई बह रिवायत-ए-ख़ुद" चैनल से ली गई है और इसमें शहीद की अपनी ज़बान से उनकी ज़िन्दगी के ख़ूबसूरत और सबक़-आमोज़ पहलुओं को पेश किया गया है।

आज जब हम शहीद ख़ामेनेई की इल्मी व दीनी ख़िदमात को देखते हैं, तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि उनकी शख्सियत की बुनियाद बचपन की उन्हीं रातों में पढ़ी जाने वाली दुआओं और ज़ियारात पर स्थापित हुई। यह वाक़िया इस बात की दलील है कि वालिद की सोहबत और हरम की पाकीज़ा फिज़ा बच्चे के दिल पर क्या गहरा नक़्श छोड़ सकती है।

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