हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हज़रत इमाम ख़ुमैनी रह. मुनाजात-ए-शाबानिय्या की फ़ज़ीलत व अहमियत के बारे में फ़रमाया करते थे:
वह दुआ व मुनाजात जो महीना-ए-शाबान में ज़िक्र हुई है, मेरे ख़्याल में शायद ही किसी और दुआ के बारे में यह बात कही गई हो कि यह दुआ सभी इमामों (अ.स.) से मतअल्लिक़ है।
यह दुआ ए शाबान, मुनाजात-ए-शाबानिय्या, सभी इमामों (अ.स.) की मुनाजात है और इसमें बहुत से मसाइल हैं, बहुत सी मआरिफ़तें (ज्ञान) हैं और उस अदब का बयान है कि इंसान को ख़ुदाये तबारक व तआला के साथ कैसे मुनाजात करनी चाहिए।
हम उन मआरिफ़ से ग़ाफ़िल हैं जो इमाम (अ.स.) हमें सिखाना चाहते हैं चूंकि मसला यह है कि वह ख़ुदा के सामने खड़े हुए, और वह जानते हैं कि वह किस बा-अज़मत हस्ती के सामने खड़े हैं, उन्हें ख़ुदाये तबारक व तआला की मआरिफ़त हासिल है और वह जानते हैं कि क्या करना है।
मुनाजात-ए-शाबानिय्या उन मुनाजातों में से है कि अगर कोई दिल-सूख्ता इंसान, कोई दिल-सूख्ता आरिफ़ इसकी दूसरों के लिए शरह करना चाहे तो बहुत क़ीमती है और शरह की मुहताज है... (सहीफ़ा-ए-इमाम, जिल्द 21, पेज 2)
क्या आपने मुनाजात-ए-शाबानिय्या पढ़ी है? ज़रूर पढ़ें जनाब! मुनाजात-ए-शाबानिय्या उन मुनाजातों में से है कि अगर इंसान इसका मुताला करे और इसमें ग़ौर करे तो इंसान को एक ख़ास मक़ाम तक पहुंचा देती है।
जिसने यह मुनाजात की है और रिवायत के मुताबिक सभी इमाम अलैहिमुस्सलाम भी पढ़ते थे, यह वह लोग थे जो हर चीज़ से बेनियाज़ थे। इसके बावजूद वह इस तरह की मुनाजात करते थे क्योंकि वह ख़ुद-बीन नहीं थे।
वह जो कुछ भी थे, ऐसे कभी नहीं थे कि वह अपने आप को देखें कि मैं इमाम सादिक़ (अ.स.) हूं, नहीं, इमाम सादिक़ (अ.स.) उस शख़्स की तरह मुनाजात करते हैं जो गोया गुनाह में डूबा हुआ है क्योंकि वह देखते हैं कि वह ख़ुद कुछ नहीं है और जो कुछ है वह नक़्स (कमी) है और जो कुछ है वह उसी (ख़ुदा) की तरफ से है।
हर कमाल उसी की तरफ से है, उसके पास ख़ुद कुछ नहीं है, अंबिया के पास भी कुछ नहीं था। सब ख़ुद से कुछ भी नहीं हैं और वही सब कुछ है, सब उसी के पीछे हैं, सब फ़ितरतें उसी के पीछे हैं लेकिन चूंकि हम महजूब (आड़ में) हैं, हम नहीं समझते कि हम उसी के पीछे हैं; जो लोग समझते हैं, वह बेनियाज़ हो जाते हैं और उसी मअनी की तरफ चले जाते हैं।
यह कमाल-ए-इन्किताअ जो उन्होंने चाहा, कमाल-ए-इन्किताअ यही है कि उन सभी चीज़ों से जो मौजूद हैं, उसकी असल जुदा हो जाए। «إِنَّهُ كَانَ ظَلُومًا جَهُولًا» जो आयत शरीफ़ा में आया है कि «إِنَّا عَرَضْنَا الْأَمَانَةَ عَلَى السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَالْجِبَالِ فَأَبَيْنَ»।
फिर फ़रमाता है: «إِنَّهُ كَانَ ظَلُومًا جَهُولًا» बाज़ कहते हैं कि «ظَلُومًا جَهُولًا» सबसे बड़ा वस्फ़ है जो ख़ुदा ने इंसान के लिए किया है; «ظَلُومًا» कि उसने सभी बुतों को तोड़ दिया और हर चीज़ को तोड़ दिया; «جَهُولًا» इसलिए कि वह किसी चीज़ की तरफ तवज्जोह नहीं देता और किसी चीज़ को उसकी तरफ मुतवज्जह नहीं करता, वह हर चीज़ से ग़ाफ़िल है।
हम इस तरह नहीं हो सकते, हम अमानतदार भी नहीं हो सकते लेकिन हम इस राह पर हो सकते हैं। (सहीफ़ा-ए-इमाम; जिल्द 19, पेज 253)
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