बुधवार 4 फ़रवरी 2026 - 14:06
रहबर ए मुअज़्ज़म, दुनिया ए इस्लाम के सबसे मज़बूत आलिम और क़ायद

हौज़ा / जामिआ बिन्तुल होदा दारुल क़ुरआन निस्वां, जौनपुर की उस्तादा ने कहा कि मौजूदा दौर में आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई, जिन्हें पूरी दुनिया इस्लामी इंक़िलाब के रहबर की हैसियत से तस्लीम करती है, उम्मत-ए-मुस्लिमा की जानिब से इस्राईल के ख़िलाफ़ मज़ाहमत जारी रखने वाले गिरोहों और इदारों के हामी की हैसियत से एक ताक़तवर और दिलेर रहनुमा हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , जामिआ बिन्तुल होदा दारुल-क़ुरआन निस्वां, जौनपुर की उस्तादा ने कहा कि मौजूदा दौर में आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई, जिन्हें ज़माना इस्लामी इंक़िलाब के रहबर के तौर पर जानता है, उम्मत-ए-मुस्लिमा की तरफ़ से इस्राईल के ख़िलाफ़ मज़ाहमती सिलसिला जारी रखने वाले गिरोहों और तंजीमों के सरपरस्त और हिमायती हैं, और इसी वजह से वह एक बहादुर और मज़बूत क़ायद की पहचान रखते हैं।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ज़िंदगी और ख़िदमात का मुख़्तसर जायज़ा:

उन्होंने रहबर-ए-मुअज़्ज़म की अज़ीम ज़िंदगी पर रोशनी डालते हुए कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई 16 जुलाई 1939 को मशहद, ईरान में पैदा हुए। उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम मशहद में हासिल की और बाद में क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया में आला तालीम हासिल की।
वह 1981 से 1989 तक ईरान के सदर रहे और 1989 से अब तक ईरान के मुन्तख़ब रहबर के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी अदा कर रहे हैं।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की तालीमात:

मुहतरमा अंजुम फ़ातिमा ने कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की तालीमात और उनकी हकीमाना बातों की बहुत अहमियत है। उन्होंने लोगों को अद्ल, इंसाफ़ और तक़वा का पैग़ाम दिया और अमल की तरफ़ तवज्जो दिलाई।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ख़िदमात:

उन्होंने रहबर-ए-मुअज़्ज़म की अज़ीम ख़िदमात का ज़िक्र करते हुए कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई ने ईरान की इंक़िलाबी तहरीक की क़ियादत की और हज़रत आयतुल्लाह ख़ुमैनी (रहमतुल्लाह अलैह) की क़ियादत में इस्लामी जम्हूरिया ईरान की बुनियाद क़ायम होने के बाद रहनुमाई और रहबरी की ज़िम्मेदारी संभाली।उन्होंने ईरान की फ़ौजी, सख़ाफ़ती, सियासी और समाजी तरक़्क़ी के लिए बहुत सी अहम कोशिशें कीं।

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई देखने में तो सिर्फ़ ईरान के रहबर-ए-इंक़िलाब नज़र आते हैं, लेकिन हक़ीक़त में वह हर मज़हब के कमज़ोर, मजबूर और महरूम लोगों के लिए एक आम रहनुमा बन चुके हैं। उनकी मक़बूलियत पूरी दुनिया में फैली हुई है। वह ऐसे सुप्रीम लीडर हैं जिनका असर दुनिया की सियासत, मआशी हालत और समाज पर साफ़ तौर पर नज़र आता है।

रहबर ए मुअज़्ज़म आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई का असर:

जामिआ बिन्तुल होदा दारुल-क़ुरआन की उस्तादा ने वली-ए-अम्र-ए-मुस्लिमीन के आलमी सतह पर असर-ओ-रसूख़ की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि उनका असर ईरान तक ही महदूद नहीं है, बल्कि दुनिया के बाहर ख़ास तौर पर मुस्लिम ममालिक और ग़ैर-इस्लामी दुनिया में भी इस क़दर गहरा और फैला हुआ है कि उसे अलग-अलग करके पहचानना मुश्किल हो जाता है।
अलबत्ता उनके पैरोकार लेबनान, इराक़ और यमन जैसे ममालिक में खुले आम देखे जा सकते हैं।

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