हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हौज़ा ए इल्मिया इमाम सादिक़ अ.स. वाशी, नवी मुंबई के उस्ताद मौलाना दअबिल असग़र ख़ान ने रहबर-ए-इंक़ेलाब-ए-इस्लामी की शख़्सियत को एक जामेअ दीनी, समाजी और इंक़ेलाबी क़ियादत क़रार देते हुए कहा कि वह ऐसी आलमी असर रखने वाली शख़्सियत हैं, जिन्हें दुनिया भर के मज़लूम और सितमदीदा तबक़ात अपना रहनुमा समझते हैं।
उन्होंने कहा कि रहबर-ए-इंक़ेलाब-ए-इस्लामी एक ऐसी जामेअ और आफ़ाक़ी, दीनी व समाजी और इंक़लाबी शख़्सियत हैं कि जिनके चश्म-ओ-अब्रू के इशारे पर न सिर्फ़ आलम-ए-इस्लाम, बल्कि पूरी काइनात में बशरियत और इंसानियत के सितम-दीदा अफ़राद गर्दिश-ए-परकार बन जाते हैं।
उन्होंने मज़ीद कहा कि इस दुनिया-ए-मुतलातिम में लोग उन्हें अपना मसीहा, लीडर और रहनुमा मानते हुए जान निछावर करते हैं चाहे फ़िलिस्तीन के मज़लूम हों या सूडान, इराक़ और सीरिया के सितम-दीदा, क्यूबा और वेनेज़ुएला की अवाम हों या आलम-ए-हस्त-ओ-बूद के गोशा-ओ-किनार में ज़ुल्म-ओ-जबर से कराहती इंसानियत।
ग़ैर-इंसानी बंदिशों के इफ़रीती चंगुल से आज़ादी के लिए तड़पते लोग उन्हें अपना मुक़्तदा, मलजा-ओ-मआवा और मज़बूत पनाहगाह मानते हुए उनके हर फ़रमान पर जान-ओ-दिल क़ुर्बान करने के लिए आमादा रहते हैं।
मौलाना दअबिल असग़र ख़ान ने कहा कि कुछ बदज़ात और दरिंदा-सिफ़त सायोनी व मग़रिबी हुक्मरान चराग़-ए-हिदायत व रहबरी को ख़ामोश करने की सई-ए-लाहासिल कर रहे हैं, मगर यह उनकी ख़ाम-ख़याली है ऐसा ख़्वाब जो कभी शर्मिंदा-ए-ताबीर नहीं हो पाएगा।
फ़ानूस बन के जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे,
वह शम्अ क्या बुझे जिसे रौशन ख़ुदा करे।
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