रविवार 8 मार्च 2026 - 10:17
शब-ए-क़द्र की रूहानियत और उसके आमाल, एक ख़ास बातचीत

शब-ए-क़द्र इस्लाम की सबसे मुकद्दस और बरकत वाली रातों में से एक है। 23वीं रात को ज़्यादा तवज्जो दी जाती है, क्योंकि कई रिवायतों में इसे शब-ए-क़द्र के तौर पर ज़्यादा क़रीब बताया गया है। यही वह रात है जिसमें क़ुरआन का नुज़ूल हुआ। इस रात इंसान के आने वाले साल के कई अहम फैसले अल्लाह के हुक्म से तय होते हैं। शब‑ए‑क़द्र का असली मक़सद यही है कि इंसान अपनी जिंदगी का जायज़ा ले और उसे बेहतर बनाने का फ़ैसला करे।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, क़ुम अल मुक़द्देसा मे रहने वाले भारतीय शिया धर्मगुरू, कुरआन और हदीस के रिसर्चर मौलाना सय्यद साजिद रज़वी से हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के पत्रकार ने शबहा ए क़द्र और इमाम अली (अ) की शहादत के दिनो से संबंधित एक खास बातचीत की जिसमे मौलाना ने शब ए क़द्र की रूहानियत और उसके आमाल पर विस्तृत जवाबात दिए । जिसे हम अपने प्रिय पाठको के लिए प्रस्तुत कर रहे है।

हौज़ाः सबसे पहले आप यह बताइए कि शब-ए-क़द्र क्या है और इस रात की अहमियत क्या है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: शब-ए-क़द्र इस्लाम की सबसे मुकद्दस और बरकत वाली रातों में से एक है। कुरआन-ए-करीम में अल्लाह तआला फरमाता है कि “लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है।” यानी इस रात में की गई इबादत, दुआ और नेक अमल हज़ार महीनों से ज्यादा अफ़ज़ल होता है। यही वह रात है जब क़ुरआन का नुज़ूल शुरू हुआ। इस रात को अल्लाह की रहमत ख़ास तौर पर बंदों पर नाज़िल होती है और फ़रिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं। इसलिए यह रात इंसान के लिए अपने गुनाहों से तौबा करने, अपनी जिंदगी को संवारने और अल्लाह से क़रीब होने का सबसे बड़ा मौक़ा है।

हौज़ाः शिया रिवायतों के मुताबिक शब-ए-क़द्र किन तारीखों में तलाश की जाती है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: तहक़ीक़ के मुताबिक रमज़ान की 19वीं, 21वीं और 23वीं रातों को शब-ए-क़द्र के तौर पर ख़ास अहमियत हासिल है। इन रातों में मोमिन ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करते हैं। ख़ास तौर पर 23वीं रात को ज़्यादा तवज्जो दी जाती है, क्योंकि कई रिवायतों में इसे शब-ए-क़द्र के तौर पर ज़्यादा क़रीब बताया गया है।

हौज़ाः शब-ए-क़द्र की शुरुआत में कौन सा अमल करना मुस्तहब है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद:शिया किताबों जैसे मफ़ातिहुल जिनान में बयान हुआ है कि इस रात की शुरुआत ग़ुस्ल से करना मुस्तहब है। इससे इंसान जिस्मानी और रूहानी तौर पर पाक होकर इबादत की तरफ़ बढ़ता है। इसके बाद दो रकअत नमाज़ पढ़ी जाती है जिसमें हर रकअत में सूरह हम्द के बाद सात बार सूरह तौहीद पढ़ी जाती है और नमाज़ के बाद सत्तर बार “अस्तग़फ़िरुल्लाहा व अतूबु इलैह” पढ़ना बहुत फज़ीलत रखता है।

हौज़ाः  क़ुरआन को सर पर रखने का अमल कैसे किया जाता है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: इस अमल में इंसान क़ुरआन को अपने सर पर रखता है और अल्लाह से क़ुरआन और अहलेबैत के वसीले से दुआ करता है। इसमें पहले कहा जाता है: “अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बि किताबिकल मुंज़ल…” फिर चौदह मासूमीन के नाम लेकर अल्लाह से रहमत और मग़फिरत मांगी जाती है। यह अमल इंसान के लिए अल्लाह की रहमत को हासिल करने और अपने आपको उसकी हिफाज़त में देने का प्रतीक है।

हौज़ाः  दुआ-ए-जौशन कबीर की क्या अहमियत है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: दुआ-ए-जौशन कबीर बहुत अज़ीम और मआरिफ़ से भरपूर दुआ है जो शब-ए-क़द्र की रातों में पढ़ी जाती है। इसमें अल्लाह तआला के सौ हिस्सों में तक़सीम किए गए हज़ार नाम और सिफ़ात बयान होते हैं। यह दुआ इंसान को अल्लाह की अज़मत और उसकी रहमत का एहसास दिलाती है और बंदे के दिल में तौबा और विनम्रता पैदा करती है।

हौज़ाः क्या शब-ए-क़द्र में क़ुरआन की तिलावत का भी ख़ास सवाब है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: जी हाँ, क्योंकि यही वह रात है जिसमें क़ुरआन का नुज़ूल हुआ। इसलिए इस रात में क़ुरआन पढ़ना और उसके मआनी पर ग़ौर करना बहुत अहम समझा जाता है। कोशिश करनी चाहिए कि इंसान सिर्फ पढ़े ही नहीं बल्कि यह भी सोचे कि क़ुरआन उससे क्या पैग़ाम दे रहा है।

हौज़ाः  शब-ए-क़द्र और इमाम अली (अ) की शहादत के दरमियान जो रिश्ता है, उसके बारे में क्या कहेंगे?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: रमज़ान की इन्हीं बरकत वाली रातों में 19वीं तारीख़ को इमाम अली (अ) को ज़र्ब लगी और 21वीं रमज़ान को आपकी शहादत हुई। इसलिए यह रातें सिर्फ इबादत ही नहीं बल्कि ग़म और इबरत की भी रातें हैं। इमाम अली (अ) की जिंदगी इंसाफ़, इबादत और इंसानियत की बेहतरीन मिसाल है, और इन रातों में उनकी याद हमें उनके रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है।

हौज़ाः  क्या शब-ए-क़द्र की रात में तौबा का ख़ास असर होता है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: जी हाँ, रिवायतों में आया है कि यह रात रहमत और मग़फिरत की रात है। अगर इंसान सच्चे दिल से तौबा करे तो अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ कर देता है। इसलिए इस रात में दिल से इस्तिग़फार करना और अपनी ग़लतियों को सुधारने का इरादा करना बहुत अहम है।

हौज़ाः शब‑ए‑क़द्र की रात जागकर इबादत करने की क्या हिकमत है?

मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: शब‑ए‑क़द्र दरअसल रूहानी जागरूकता की रात है। जब इंसान रात की ख़ामोशी में अल्लाह के सामने खड़ा होता है तो उसका दिल ज़्यादा एकाग्र और सच्चाई के साथ दुआ करता है। इसलिए उलमा कहते हैं कि इस रात की इबादत इंसान के दिल को ग़फ़लत से जगाने का ज़रिया बनती है।


हौज़ाः  शब‑ए‑क़द्र की रात जागकर इबादत करने की क्या हिकमत है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: शब‑ए‑क़द्र दरअसल रूहानी जागरूकता की रात है। जब इंसान रात की खामोशी में अल्लाह के सामने खड़ा होता है तो उसका दिल ज्यादा एकाग्र और सच्चाई के साथ दुआ करता है। इसलिए उलमा कहते हैं कि इस रात की इबादत इंसान के दिल को ग़फ़लत से जगाने का ज़रिया बनती है।

हौज़ाः  अगर कोई व्यक्ति पूरी रात इबादत न कर सके तो उसे क्या करना चाहिए?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: इस्लाम आसानी का दीन है। अगर कोई पूरी रात जाग न सके तो कम से कम कुछ समय इबादत, दुआ और क़ुरआन की तिलावत में बिताए। दो‑चार रकअत नमाज़, थोड़ी तिलावत और दिल से की गई तौबा भी अल्लाह के यहाँ बहुत क़ीमती होती है।

हौज़ाः  क्या शब‑ए‑क़द्र में  सामूहिक इबादत की भी अहमियत है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: जी हाँ, मस्जिदों और इमामबाड़ों में जब लोग मिलकर इबादत करते हैं तो एक ख़ास रूहानी माहौल बनता है। सामूहिक दुआ और ज़िक्र को अल्लाह जल्दी क़ुबूल करता है  और इससे ईमान मज़बूत होता है और लोगों के दिलों में भाईचारा बढ़ता है।

हौज़ाः  इस रात में सदक़ा और खैरात देने की क्या फ़ज़ीलत है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: शब‑ए‑क़द्र में हर नेक अमल का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। अगर कोई व्यक्ति इस रात किसी ज़रूरतमंद की मदद करे, ग़रीबों को सदक़ा दे या किसी का दिल ख़ुश करे तो उसका बहुत बड़ा अज्र मिलता है। इससे समाज में इंसानियत और मोहब्बत भी बढ़ती है।

हौज़ाः  शब‑ए‑क़द्र में तक़दीर लिखे जाने का क्या मतलब है?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ इस रात इंसान के आने वाले साल के कई अहम फैसले अल्लाह के हुक्म से तय होते हैं। लेकिन साथ ही यह भी बताया गया है कि दुआ, तौबा और अच्छे अमल इंसान की तक़दीर को बेहतर बना सकते हैं।

हौज़ाः  क्या महिलाएँ भी घर पर शब‑ए‑क़द्र के आमाल कर सकती हैं?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: बिल्कुल। इबादत के लिए मस्जिद जाना ज़रूरी नहीं है। महिलाएँ घर पर भी नमाज़, कुरआन की तिलावत, दुआ और ज़िक्र के साथ इस मुबारक रात को गुज़ार सकती हैं। अल्लाह के यहाँ सबसे ज़्यादा अहमियत नियत और दिल की सच्चाई की होती है अलबत्ता अमल का  होना नियत को ज़ाहिर करता है।

हौज़ाः  शब‑ए‑क़द्र के बाद हमें अपनी जिंदगी में क्या बदलाव लाना चाहिए?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: शब‑ए‑क़द्र का असली मक़सद यही है कि इंसान अपनी जिंदगी का जायज़ा ले और उसे बेहतर बनाने का फ़ैसला करे। अगर इस रात के बाद इंसान गुनाहों से बचने, नमाज़ की पाबंदी करने और अच्छे अख़लाक अपनाने की कोशिश करे तो यही इस रात का सबसे बड़ा फायदा है।

हौज़ाः आखिर में आप समाज और नौजवानों के लिए क्या पैग़ाम देना चाहेंगे?  
मौलाना सय्यद साजिद हुसैन रिजवी मोहम्मद: मेरा पैग़ाम यही है कि शब-ए-क़द्र को सिर्फ एक रस्म न समझा जाए। यह वह रात है जो इंसान की ज़िंदगी को बदल सकती है। अगर हम इस रात को जाग कर, इबादत, दुआ, क़ुरआन और तौबा के साथ गुज़ारें तो यह हमारी रूह को नई ताक़त दे सकती है। ख़ास तौर पर नौजवानों को चाहिए कि वे इन बरकत वाली रातों से फ़ायदा उठाएँ और अपनी ज़िंदगी को इल्म, अख़लाक़ और इबादत से रोशन करें।

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