हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के तनाव के संदर्भ में सूरह बक़रा की आयत 194 की रोशनी में जवाबी सैन्य कार्रवाई की शरई हैसियत पर एक महत्वपूर्ण बहस सामने आई है। एक फ़िक़्ह के विशेषज्ञ ने इस संबंध में स्पष्ट किया है कि क़ुरआन-ए-करीम यद्यपि दुश्मन की जारहियत के मुकाबले में "मुक़ाबला ब-मिस्ल" की इजाजत देता है, तथापि इसकी सीमाएँ और शर्तें भी निर्धारित हैं, जिनकी पाबंदी आवश्यक है।
फ़िक़्ह के विशेषज्ञ के अनुसार, उक्त आयत «فمن اعتدیٰ علیکم فاعتدوا علیہ بمثل ما اعتدیٰ علیکم» (जो तुम पर हमला करे, तो तुम भी उस पर वैसा ही हमला करो, जैसा उसने तुम पर किया है) इस सिद्धांत की बुनियाद प्रदान करती है कि यदि दुश्मन हमला करे तो उसी प्रकार का जवाब देना जायज़ है। यह हुक्म केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भी लागू होने योग्य है। हालाँकि इस इजाजत को निरपेक्ष नहीं समझना चाहिए, बल्कि क़ुरआन की अन्य आयतें इसके दायरे को सीमित करती हैं।
उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, आम नागरिकों, जैसे महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग और बीमार व्यक्तियों को निशाना बनाना सख्ती से वर्जित है। इसी प्रकार, युद्धबंदियों के साथ दुर्व्यवहार या उनकी हत्या की भी अनुमति नहीं दी गई है। इसके अलावा, ऐसी विनाशकारी रणनीति या हथियार जिनसे व्यापक पैमाने पर मानवीय और पर्यावरणीय नुकसान हो, जैसे सामूहिक विनाश के हथियार, उनका उपयोग भी मूल रूप से हराम ठहराया गया है।
फ़िक़्ह के विशेषज्ञ ने कहा कि क़ुरआन में "मुक़ाबला ब-मिस्ल" के विभिन्न पहलू बयान हुए हैं, जिनमें प्रतिशोध, बदला और दंड जैसे अवधारणाएँ शामिल हैं, लेकिन हर स्थिति में न्याय, तक़्वा और मानवीय सिद्धांतों को मुक़द्दम रखा गया है। उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि दुश्मन की जारहियत के जवाब का हक़ मुस्लिम है, लेकिन इस्लामी हुकूमत इस हक़ को इस्तेमाल करते समय अख़लाक़ी (नैतिक) और शरई सीमाओं की पाबंद होती है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में, जब दुश्मन का ख़तरा तत्काल और गंभीर हो और प्रतिक्रिया का अवसर शेष न रहे, तो बचाव भी व्यवस्था की रक्षा और "क़ायदा-ए-इज़्तिरार" के तहत जायज़ हो सकता है।
खुलासा यह है कि क़ुरआन-ए-करीम ने जहाँ बचाव और जवाबी कदम की इजाजत दी है, वहीं इसे अख़लाक़ी सीमाओं का पाबंद भी बनाया है, और आम नागरिकों को निशाना बनाना या गैर-इंसानी तरीकों का इस्तेमाल किसी भी सूरत में जायज़ नहीं है।
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