सोमवार 20 अप्रैल 2026 - 19:05
कर्बला ए हिंद' जलालपुर में शहीद-ए-उम्मत का चेहलुम, उम्मत की एकता और चेतना जागरण का जोशीला संदेश 

कर्बला ए हिंद जलालपुर के ऐतिहासिक स्थल 'बड़ी दरगाह' में इस्लामी जगत की महान आध्यात्मिक और बौद्धिक हस्ती हज़रत आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामेनई (र) की याद में एक अत्यंत गरिमापूर्ण चेहलुम का आयोजन किया गया, जिसमें पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वानों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक एवं राजनीतिक हस्तियों और जनता की बड़ी संख्या ने भाग लिया। यह शोक सभा एकता, भाईचारे, उम्माह की जागरूकता और शहीद-ए-उम्मत के बौद्धिक मिशन के साथ नए सिरे से प्रतिज्ञा का एक प्रभावशाली उदाहरण बनकर सामने आई।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, जलालपुर, अंबेडकरनगर / इस्लामी जगत की महान आध्यात्मिक और बौद्धिक हस्ती हज़रत आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामेनई (र) की याद में जलालपुर के ऐतिहासिक स्थल बड़ी दरगाह में एक गरिमापूर्ण और आत्मिक शोक सभा 'चेहलुम' के नाम से आयोजित की गई, जिसमें न केवल स्थानीय बल्कि पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वानों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक एवं राजनीतिक हस्तियों और जनता की बड़ी संख्या ने भाग लिया।

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यह सभा अपनी अनोखी पृष्ठभूमि, एकता और भाईचारे के संदेश तथा बौद्धिक एवं राष्ट्रीय सद्भाव के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में सामने आई।

कार्यक्रम की शुरुआत पवित्र कुरान की तिलावत से हुई, जिसका सौभाग्य मौलाना हैदर मेहदी करीमी और कारी अहमद कासिमी को प्राप्त हुआ। उनकी दिल को छू लेने वाली आवाज़ों ने समागम पर आध्यात्मिकता छा दी और सभा को एक पवित्र वातावरण प्रदान किया।

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चेहलुम सभा का संचालन प्रोफेसर अब्बास रज़ा नैर (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने किया। उनका तर्कपूर्ण वार्तालाप और सुसंगत प्रस्तुति शैली ने पूरे कार्यक्रम को एक मजबूत सूत्र प्रदान किया, जिसे उपस्थित लोगों ने बहुत सराहा।

इस अवसर पर हिंदू धर्म से स्वामी सारंग की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जिन्होंने रहबर-ए-मुअज़्ज़म (नेता) के प्रति अपने दिल की महोब्बत, श्रद्धा और मानवता के प्रति उनके भूमिका को बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया। उन्होंने अपने शोक शब्दों में अंतर-धार्मिक सद्भाव और मानवता के उच्च सिद्धांतों को उजागर किया, जिसने श्रोताओं के दिलों को छू लिया।

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अनुवादक के रूप में मौलाना तक़ी हैदर नकवी ने नुमाइंदा-ए-वली-ए-फकीह हिंद के वक्तव्यों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे विशेष अतिथि का संदेश हर वर्ग तक आसानी से पहुँच गया। शोक शब्द प्रस्तुत करने वालों में मौलाना मुहम्मद मोहसिन (प्रिंसिपल, वसीक़ा अरबी कॉलेज, फैजाबाद), मौलाना फज़ल मुमताज़ (जौनपुर), मौलवी नजीबुल्लाह (खतीब, मस्जिद करामतिया, जलालपुर), मौलाना हसन मेहदी वाएज़ (जलालपुर), मौलाना मेहदी हसन वाएज़ (जलालपुर) और मौलवी फज़लुल मन्नान रहमानी (शाही इमाम, टीले वाली मस्जिद, लखनऊ) शामिल थे, जिन्होंने अपने-अपने अंदाज में रहबर-ए-उम्मत की सेवाओं, विचारों और मजलूमाना शहादत को श्रद्धांजलि अर्पित की।

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कार्यक्रम के विशेष अतिथि नुमाइंदा-ए-वली-ए-फकीह हिंद, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही थे, जिन्होंने अपने व्यापक भाषण में रहबर-ए-मुअज़्ज़म की राजनीतिक सूझ-बूझ, धार्मिक सेवाओं और मुस्लिम उम्माह के लिए उनकी कुर्बानियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अपने भाषण के दौरान कर्बला के दुखों का भी उल्लेख किया, जिसने वातावरण को शोक और पीड़ा से भर दिया और उपस्थित लोगों की आँखें नम हो गईं।

मंच पर जलालपुर सहित पूर्वांचल के कई प्रतिष्ठित विद्वान, सम्मानित नागरिक और सामाजिक हस्तियाँ उपस्थित थीं। साथ ही, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को व्यापक और एकीकृत संदेश का वाहक बना दिया।

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सभा की पृष्ठभूमि जो सुंदर और अर्थपूर्ण रूप से प्रस्तुत की गई थी, एक ओर धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीक थी तो दूसरी ओर धैर्य, कुर्बानी और संघर्ष की झलक स्पष्ट थी। यह पृष्ठभूमि वास्तव में इस बात का प्रतिबिंब थी कि रहबर-ए-उम्मत का जीवन इबादत, नेतृत्व और प्रतिरोध का सुंदर सम्मिश्रण था, जिसने उम्माह को जागरूकता, चेतना और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया।

कर्बला ए हिंद' जलालपुर में शहीद-ए-उम्मत का चेहलुम, उम्मत की एकता और चेतना जागरण का जोशीला संदेश 


सभा के दौरान मौलाना डॉ. रईस हैदर वाएज़ जलालपुरी ने मंच पर उपस्थित सभी विद्वानों, जाफ़रिया संप्रदाय के युवाओं, श्रोताओं, आयोजकों, पुलिस प्रशासन, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों सहित सभी सम्मानित अतिथियों का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया और आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के कार्यक्रम आगे भी उम्माह की एकता और चेतना जागरण का जरिया बनते रहेंगे।

यह शोक सम्मेलन न केवल एक यादगार कार्यक्रम साबित हुआ, बल्कि इसने यह संदेश भी दिया कि शहीद-ए-उम्मत का विचार और उनका मिशन आज भी जीवित है और मुस्लिम उम्माह के दिलों में सदैव जीवित रहेगा।

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