हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, क़ुरान सुरक्षा को हर नेमत पर प्राथमिकता देता है; हज़रत इब्राहीम (अ) ने सबसे पहले मक्का के लिए सुरक्षा की प्रार्थना की। इस्लाम, दुनिया के क़ानूनों से परे, व्यक्तियों की प्रतिष्ठा की सुरक्षा, बदगुमानी और जासूसी से मना करके सुनिश्चित करता है और आंतरिक हिंसा को हल करने के लिए शांति की पहल और अंततः न्यायपूर्ण मुक़ाबले का आदेश देता है। आगे प्रस्तुत है इसी विषय पर प्रश्नोत्तर, जो आप बुद्धिजीवियों के समक्ष है।
प्रश्न:
सामाजिक सुरक्षा के बारे में क़ुरान का क्या दृष्टिकोण है?
संक्षिप्त उत्तर:
क़ुरान सुरक्षा के उपकार को हर दूसरे वरदान पर प्राथमिकता देता है। इसीलिए जब हज़रत इब्राहीम (अ) मक्का की सूखी एवं बिना पानी-घास के भूमि में आए और काबा का निर्माण किया, तो क़ुरान कहता है कि उस भूमि के निवासियों के लिए उन्होंने सबसे पहली चीज़ जो अल्लाह से माँगी, वह सुरक्षा थी। यहाँ तक कि इस्लाम में एक प्रकार की सुरक्षा का प्रावधान है, जो दुनिया के किसी भी क़ानून में नहीं है: व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और आबरू की सुरक्षा। स्पष्ट शब्दों में, इस्लाम किसी भी मुसलमान को दूसरों के प्रति बुरा गुमान रखने की अनुमति नहीं देता, और यह उच्चतम स्तर की सुरक्षा है, जो केवल एक ईमान वाले समाज में ही संभव है।
विस्तृत उत्तर:
पवित्र क़ुरान सुरक्षा के उपकार (नेमत) को इतना महान मानता है कि उसे हर दूसरी चीज़ पर प्राथमिकता देता है। इसी कारण जब इब्राहीम ख़लील (अ.स.) मक्का की सूखी, तपती, बिना पानी और घास के भूमि में आए और काबा का निर्माण किया, तो क़ुरान कहता है कि उस भूमि के भविष्य के निवासियों के लिए उन्होंने सबसे पहली चीज़ जो अल्लाह से माँगी, वह सुरक्षा की नेमत थी:
"رَبَّ اجْعَلْ هذا بَلَداً ءَامِناً وَ ارْزُقْ اَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرتِ रब्बेज'अल हाज़ा बलदन आमिनन वरज़ुक़ अह्लहू मिनसमरात" (हे मेरे पालनहार! इस भूमि को सुरक्षित शहर बना और इसके निवासियों को तरह-तरह के फलों से रोज़ी दे) — (सूर ए बक़रा, आयत 126)
और दूसरे स्थान पर उनसे इसी अर्थ को दूसरे शब्दों में नक़ल करता है:
"رَبِّ اجْعَلْ هذا الْبَلَدَ امِناً و اجنبنی و بنیَّ ان نعبد الاْصنامَ रब्बिज'अल हाज़ल बलद अमिनन वजनिबनी व बनिय्या अन न'बुदल असनाम" (हे मेरे पालनहार! इस शहर [मक्का] को सुरक्षित शहर बना, और मुझे और मेरी संतान को मूर्तियों की पूजा से दूर रख) — (सूर ए इब्राहीम, आयत 35)
क़ुरान असुरक्षा को हत्या और खून-खराबे से भी बदतर मानता है और कहता है:
"و الْفتنة اَشدُّ مِنَ الْقَتْلِ वल फ़ित्नतु अशद्दु मिनल क़त्लि" (फ़ितना खून-खराबे से भी बदतर है) — (सूर ए बक़रा, आयत 191)
यद्यपि 'फ़ित्ना' के कई अर्थ हैं (जैसे शिर्क, यातना, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार), लेकिन यह दूर नहीं कि उपरोक्त आयत का अर्थ इतना व्यापक हो कि वह इन सभी अर्थों को शामिल कर ले। अतः समाज में असुरक्षा और भ्रष्टाचार पैदा करना खून-खराबे से भी ऊपर है; क्योंकि यह स्वयं खून-खराबे का स्रोत बनता है और अन्य भ्रष्टाचारों को भी जन्म देता है।
यह बात भी कहने योग्य है कि इस्लाम में एक प्रकार की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है जो दुनिया के किसी भी क़ानून में नहीं है: वह व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और सम्मान की सुरक्षा, यहाँ तक कि दूसरों के विचारों के वातावरण में भी।
स्पष्ट शब्दों में, इस्लाम किसी भी मुसलमान को दूसरों के प्रति बदगुमानी और बुरा ख़याल रखने की अनुमति नहीं देता है और अपने विचार के वातावरण में दूसरों की प्रतिष्ठा और सम्मान को धूमिल करे। इसी संदर्भ में सूरह हुजुरात, आयत 12 में पढ़ते हैं:
"یَا أَیُّهَا الَّذِینَ آمَنُوا اجْتَنِبُوا کَثِیراً مِنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ وَلاَ تَجَسَّسُواया अय्युहल्लज़ीना आमनुज्तनिबू कसीरन मिनज़ ज़न्नि इन्ना ब'अज़ज़ ज़न्नि इस्मुन वला तजस्ससू" (ऐ ईमान लाने वालो! बहुत से गुमानों से बचो, क्योंकि कुछ गुमान पाप होते हैं; और (किसी के बारे में) टोह-तलाश मत करो।)
इस्लाम चाहता है कि इस्लामी समाज में पूर्ण सुरक्षा का राज़ हो; न केवल लोग एक-दूसरे पर हमला न करें, बल्कि ज़बान से भी, और इससे ऊपर, विचारों और ख़यालों के स्तर पर भी एक-दूसरे की जान-माल-इज़्ज़त सुरक्षित महसूस करें; और हर कोई यह महसूस करे कि दूसरा व्यक्ति अपने ख़यालों के क्षेत्र में उस पर तोहमतों के तीर नहीं चला रहा है — और यह उच्चतम स्तर की सुरक्षा है, जो केवल एक ईमानवाले और इस्लामी क़ानूनों वाले समाज में ही संभव है।
इस्लाम ने इस्लामी समाजों की आंतरिक सुरक्षा को इतना महत्व दिया है कि आंतरिक मतभेदों और झगड़ों में, जब शांतिपूर्ण तरीके प्रभावी न हों, तो बल और सैन्य शक्ति का उपयोग करने की अनुमति दी है। उसी सूरह हुजुरात (जो एक अर्थ में 'सुरक्षा वाली सूरह' है) की आयत 9 में पढ़ते हैं:
"व इन ताइफतानि मिनल मोमिनीनक़तलू फ़अस्लिहू बैनहुमा फ़इन बग़त इहदाहुमा अलल उख़रा फ़क़ातिलुल्लती तबग़ी हत्ता तफ़ीआ इला अम्रिल्लाहि फ़इन फ़ाअत फ़अस्लिहू बैनहुमा बिल'अद्लि व अक़सितू इन्नल्लाह युहिब्बुल मुक़्सितीन"
(और यदि ईमान वालों में से दो गुट आपस में लड़ जाएँ, तो उनके बीच सुलह कराओ। फिर यदि एक गुट दूसरे पर ज्यादती करे, तो उस ज्यादती करने वाले से लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर लौट आए। और यदि वह लौट आए, तो उन दोनों के बीच न्यायपूर्ण सुलह करा दो, और न्याय करो; निश्चय अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है।) — (सूर ए हुजुरात, आयत 9)
इस आयत के शब्दों पर ध्यान से ग़ौर करें; इसका प्रत्येक वाक्य किसी भी प्रकार की सामाजिक असुरक्षा को समाप्त करने के लिए, सर्वोत्तम शांतिपूर्ण तरीक़ों का उपयोग करने और अंततः — यदि दूसरे तरीके प्रभावकारी न हों — बल का सहारा लेने की सटीक योजना को दर्शाता है।
स्पष्ट है कि इस आयत में संबोधन समूचे इस्लामी समाज की ओर है या दूसरे शब्दों में, इस्लामी सरकार की ओर। ("पैग़ाम-ए-क़ुरआन", आयतुल्लाह अल-उज़्मा नासिर मकारिम शिराज़ी, दारुल कुतुबिल इस्लामियाह, तेहरान, 1386 हिजरी शम्सी, जिल्द 8, पृष्ठ 261)
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