शुक्रवार 12 जून 2026 - 06:03
मुबाहेले के माध्यम से इमाम काज़िम (अ) द्वारा अंतिम प्रमाण प्रस्तुत करना

हज़रत इमाम मूसा बिन जाफ़र काज़िम (अ) ने फ़रमाया: हारून रशीद ने आदेश दिया कि मुझे मदीना से उसके पास (बग़दाद) लाया जाए। एक सभा में उसने मुझसे पूछा: "आप अपने शियाओं को इस बात से क्यों नहीं रोकते कि वे आपको ‘या इब्न रसूलिल्लाह’ (ऐ अल्लाह के रसूल के बेटे) कहें और आपको पैग़म्बर की संतान कहकर पुकारें? जबकि आप लोग तो अली की संतान हैं, और फ़ातिमा तो केवल एक माध्यम थीं। संतान की वंशावली पिता की ओर से मानी जाती है, माँ की ओर से नहीं।"

लेखक: आबिद रज़ा

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | हज़रत इमाम मूसा बिन जाफ़र काज़िम (अ) ने फ़रमाया: हारून रशीद ने आदेश दिया कि मुझे मदीना से उसके पास (बग़दाद) लाया जाए। एक सभा में उसने मुझसे पूछा: "आप अपने शियाओं को इस बात से क्यों नहीं रोकते कि वे आपको ‘या इब्न रसूलिल्लाह’ कहें और आपको पैग़म्बर की संतान कहकर पुकारें? जबकि आप लोग अली की संतान हैं और फ़ातिमा तो केवल एक माध्यम थीं, तथा संतान की पहचान पिता से होती है, माँ से नहीं।"

इमाम अलैहिस्सलाम ने उसके उत्तर में सूर ए अनआम की आयत 84 की तिलावत की:

"और हमने इब्राहीम को इस्हाक़ और याक़ूब प्रदान किए, और उन सबको मार्गदर्शन दिया। इससे पहले हमने नूह को भी मार्गदर्शन दिया था, और उनकी संतानों में से दाऊद, सुलेमान... तथा ज़करिया, यह्या और ईसा को भी मार्गदर्शन दिया।"

इसके बाद इमाम (अ) ने हारून से पूछा:

"ईसा का पिता कौन था?"

हारून ने उत्तर दिया:

"उनका कोई पिता नहीं था। वे अल्लाह के आदेश और रूहुल-कुदुस के माध्यम से पैदा हुए थे।"

इमाम काज़िम (अ) ने फ़रमाया:

"जिस प्रकार हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को उनकी माता हज़रत मरियम के माध्यम से नबियों की संतान में गिना गया है, उसी प्रकार हमें भी हमारी माता फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा के माध्यम से पैग़म्बर की संतान में शामिल किया गया है।"

हारून ने प्रभावित होकर कहा:

"बहुत अच्छा! मुझे कोई और प्रमाण भी दीजिए।"

इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

"सम्पूर्ण उम्मत इस बात पर सहमत है कि जब रसूलुल्लाह (स) ने नज़रान के ईसाइयों को मुबाहला के लिए बुलाया, तो आपके साथ अली, फ़ातिमा, हसन और हुसैन (अ) के अतिरिक्त कोई और उपस्थित नहीं था। और अल्लाह तआला ने इस संबंध में फ़रमाया:

‘फिर यदि ज्ञान आ जाने के बाद भी कोई तुमसे इस विषय में विवाद करे, तो कह दो: आओ, हम अपने बेटों को बुलाएँ और तुम अपने बेटों को बुलाओ, हम अपनी स्त्रियों को बुलाएँ और तुम अपनी स्त्रियों को बुलाओ, और हम अपने प्राणों को बुलाएँ और तुम अपने प्राणों को बुलाओ।’ (आले इमरान: 61)

अतः इस आयत में ‘हमारे बेटे’ से अभिप्राय हसन और हुसैन हैं, ‘हमारी स्त्रियाँ’ से अभिप्राय फ़ातिमा हैं, और ‘हमारे प्राण’ से अभिप्राय अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम हैं।"

यह सुनकर हारून निरुत्तर और असहाय हो गया तथा बोला:

"बहुत अच्छा!"

स्रोक्ष: अल-इख़्तिसास (शैख मुफ़ीद), पृष्ठ 56।

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