शुक्रवार 26 जून 2026 - 22:57
शाम-ए-ग़रीबाँ; वह दुखभरी रात जिस पर आसमान भी रो पड़ा

शाम-ए-ग़रीबाँ केवल हमें रुलाने के लिए नहीं आती, बल्कि यह बताने आती है कि सत्य के मार्ग में बलिदान की अंतिम मंज़िल क्या होती है, सब्र की मेराज क्या होती है, और अत्याचार सहने की वह अवस्था क्या होती है, जब इंसान के पास कुछ भी शेष नहीं रहता, फिर भी वह अल्लाह की मरज़ी पर प्रसन्न रहता है।

लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | शाम-ए-ग़रीबाँ... यह वह शाम है, जिसकी कल्पना मात्र से दिल कांप उठता है, आँखें नम हो जाती हैं और आत्मा पर दुख का मानो एक पहाड़ टूट पड़ता है। आशूरा का सूरज डूब चुका था, लेकिन परेशानीयो की रात अभी शुरू हुई थी। कर्बला का मैदान शांत था, मगर यह ऐसी खामोशी थी जिसके सीने में हजारों सिसकियाँ दफ़्न थीं। जब हवा चलती तो ऐसा महसूस होता मानो हर झोंका "हाय हुसैन" की पुकार लेकर गुज़र रहा हो। फ़ुरात की लहरें किनारों से टकरातीं तो ऐसा प्रतीत होता मानो वे भी शर्म से सिर झुकाकर रो रही हों कि जिस नदी का पानी जानवरों के लिए भी उपलब्ध था, उसी के किनारे अल्लाह के रसूल के नवासे को प्यासा शहीद कर दिया गया।

ज़रा कर्बला के मैदान पर नज़र डालिए... जहाँ कुछ घंटे पहले "अल्लाहु अकबर" की गूँज थी, अब वहाँ बिना दफ़न और बिना कफ़न के लाशे पड़े हैं। किसी का सिर धड़ से अलग है, किसी के हाथ कटे हुए हैं, किसी के सीने पर भालों और तीरों के गहरे घाव हैं। कहीं जवान बेटे का पार्थिव शरीर है, कहीं बूढे सहाबी का शरीर पड़ा है, तो कहीं एक मासूम शहजादे की देह मिट्टी पर पड़ी हुई है। न कोई उन्हें कफ़न देने वाला है, न कोई उनके लिए प्रार्थना पढ़ने वाला, न कोई उनके घावों पर हाथ रखने वाला। शाम ढल चुकी है, लेकिन शहीद अब भी उसी तपती रेत पर पड़े हैं।

अब खेमों की ओर देखिए... आग ने चारों ओर अपना साम्राज्य फैला लिया है। लपटें आसमान को छू रही हैं। धुआँ उठ रहा है। बच्चों की चीखें, महिलाओं की आहें, सिसकियों की आवाज़ें और एक-दूसरे को पुकारती हुई आवाज़ें... ऐसा लगता है मानो क़यामत का एक दृश्य धरती पर उतर आया हो।

नन्हे बच्चे भय से काँप रहे हैं। कोई अपनी माँ का दामन पकड़े हुए है, कोई अपने पिता को खोज रहा है, कोई अपने चाचा को पुकार रहा है। किसी की आँखों के आँसू सूख चुके हैं, तो किसी की रुलाई थमने का नाम नहीं ले रही। वे समझ ही नहीं पा रहे कि सुबह तक जो चेहरे उनके चारों ओर थे, वे अचानक कहाँ चले गए।

और इसी स्थिति में एक बहन है... जिसका अपना हृदय शोक से छलनी है, लेकिन उसे रोने की भी फुर्सत नहीं। एक ओर भाई का पार्थिव शरीर रणभूमि में पड़ा है, दूसरी ओर अनाथ बच्चों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर है। वह एक बच्चे को संभालती है तो दूसरा रोने लगता है। वह एक खेमे की आग बुझाने बढ़ती है तो दूसरी ओर किसी मासूम की चीख सुनाई देती है। उसका अपना दिल भाई के ग़म में तड़प रहा है, लेकिन उसे हर पल अनाथ बच्चों को ढाढ़स बँधाना है।

रात और गहरी होती जा रही है। आकाश में सितारे निकल आए हैं, लेकिन कर्बला की धरती पर अब कोई दीपक नहीं बचा। खेमे जल चुके हैं। महिलाओं और बच्चों के लिए न बिस्तर है, न छाया, न पानी और न कोई सुविधा। तपती हुई रेत ही उनका बिस्तर है, खुला आसमान ही उनकी छत है, और दुःख ही उनका एकमात्र साथी है।

कर्बला की इस रात का सबसे बड़ा दर्द केवल यह नहीं कि उनके प्रियजन शहीद हो गए, बल्कि यह भी है कि शहीदों के पार्थिव शरीर मैदान में पड़े हैं और उनकी बहनें, बेटियाँ, पत्नियाँ तथा बच्चे उनके पास जाकर अंतिम बार दर्शन भी नहीं कर सकते। रात का अंधकार, दुश्मन का पहरा, जलते हुए खेमे और अनाथ बच्चों की आहें... हर दृश्य हृदय को चीर देता है।

शाम-ए-ग़रीबाँ केवल हमें रुलाने के लिए नहीं आती, बल्कि यह बताने आती है कि सत्य के मार्ग में बलिदान की अंतिम मंज़िल क्या होती है, धैर्य की सर्वोच्च अवस्था क्या होती है और अत्याचार सहने की वह स्थिति क्या होती है, जब इंसान के पास कुछ भी शेष नहीं रहता, फिर भी वह ईश्वर की इच्छा से संतुष्ट रहता है।

जब भी शाम-ए-ग़रीबाँ का उल्लेख होता है, दिल अपने आप कर्बला की ओर उड़ जाता है, आँखें नम हो जाती हैं और ज़ुबान से अनायास यह पुकार निकल पड़ती है—

हाय कर्बला के ग़रीब...

हाय हुसैन के अनाथ बच्चे...

हाय बेसहारा ज़ैनब...

हाय जलते हुए खेमे...

हाय बिना दफ़न और बिना कफ़न के शहीद...

हाय शाम-ए-ग़रीबाँ...

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha