शनिवार 27 जून 2026 - 09:08
ज़ियारत-ए-आशूरा | इमाम हुसैन (अ) की शफ़ाअत के योग्य कौन लोग हैं?

ज़ियारत-ए-आशूरा की व्याख्या के अंत में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन जवाद मुहद्देसी ने इस ज़ियारत के अंतिम हिस्सों को समझाते हुए “शफ़ाअत” और अहलेबैत (अ) के साथ निरंतर जुड़ाव के महत्व को स्पष्ट किया और इस ज़ियारत में माँगी गई मुख्य इच्छाओं को एक आदर्श हुसैनी जीवन के रूप में संक्षेप किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मोहर्रम के अवसर पर “ज़ियारत-ए-आशूरा” पर विशेष श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है, जिसमें इसके अर्थ और संदेशों को समझाया जा रहा है, ताकि अहलेबैत (अ) की शिक्षाओं तक बेहतर पहुँच बनाई जा सके।

इस अंतिम हिस्से में कहा गया है कि हम इमाम हुसैन (अ) और उनके साथ शहीदों को सलाम करते हैं:

व अलल अरवाहिल लति हल्लत बे फ़ेनाएका और उन रूहों पर सलाम जो आपके आँगन में ठहरी हुई हैं।”

यह सलाम हमेशा के लिए है—जब तक दुनिया कायम है, दिन-रात चलते रहेंगे और आसमान व ज़मीन बाकी रहेंगे।

इसके बाद हम दुआ करते हैं कि वला जअलाहुल्लाहो आखेरल अहदे मिन्नी लेज़ियारतेकुम और यह हमारी आख़िरी ज़ियारत न हो, बल्कि हमें बार-बार ज़ियारत-ए-आशूरा पढ़ने और इमाम हुसैन (अ) के रौज़े की हाज़िरी तथा अरबईन जैसे अवसरों की ज़ियारत का अवसर मिलता रहे।

फिर हम इमाम हुसैन (अ), हज़रत अली अकबर (अ), उनके परिवार और साथियों पर सलाम भेजते हैं और फिर उन लोगों पर लानत करते हैं जिन्होंने कर्बला के अन्याय में भूमिका निभाई—जैसे यज़ीद, इब्न ज़ियाद, उमर बिन सअद, शिमर और उनके समर्थक।

इसके बाद दुआ अल्लाहुम्मा लकल हम्दो हम्दश शाकेरीन के माध्यम से हम अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं कि उसने हमें अहलेबैत के ग़म में शामिल होने की तौफ़ीक दी। यह भी एक बड़ी नेमत है कि इंसान अहलेबैत के दुख में दुखी और उनकी खुशी में खुश होता है। यह एक शुक्र की बात है। जबकि कुछ लोग ऐसे दिनों में लापरवाही से खुशी मनाते हैं, खुशकिस्मत हैं वे लोग जिनका दिल दुखी रहता है और जो इस बात के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं कि उन्हें अहलेबैत (अ) की पहचान और समझ दी गई है—ताकि वे उनकी खुशी में खुश होते हैं और उनके ग़म में दुखी रहते हैं।

इसके बाद व सब्बित ली क़दमा सिद़किन इंदका मअल हुसैन (अ) व अस्हाबिल हुसैन ... वरज़ुक़नी शफ़ाअतल हुसैन यौमल वुरूद शफ़ाअत की दुआ करते हैं और उनसे जुड़े रहने की दुआ करते हैं। यौमल वुरूद यानी क़यामत के दिन इमाम हुसैन (अ) की शफ़ाअत की उम्मीद की जाती है। लेकिन शफ़ाअत हर किसी को नहीं मिलती, इसके लिए योग्य होना आवश्यक है।

जो लोग अन्याय, हक़्क़ुन्नास और बुराई से दूर रहकर आते हैं, वही शफ़ाअत के योग्य होते हैं, जबकि अत्याचार करने वालों के लिए यह आसान नहीं होता।

शफ़ाअत अहलेबैत (अ) का हक़ है और हम अल्लाह से इसकी दुआ करते हैं।

इसके बाद ज़ियारत-ए-आशूरा की 11 मुख्य इच्छाओं का संक्षेप इस प्रकार है:

  1. बदले और हक़ की तलब की तौफ़ीक 
  2. अल्लाह के यहाँ इमाम हुसैन (अ) के ज़रिए सम्मान प्राप्त करना
  3. अहलेबैत के साथ दुनिया और आख़िरत में साथ रहने की दुआ
  4. ईमान पर दृढ़ रहने की दुआ
  5. अल्लाह के यहाँ ऊँचा दर्जा पाने की दुआ
  6. कर्बला के ग़म पर बड़ा अज्र पाने की दुआ
  7. अल्लाह की रहमत, सलामती और माफ़ी की दुआ
  8. जीवन और मृत्यु हुसैनी मार्ग पर होने की दुआ
  9. ज़ालिमों के लिए सज़ा की दुआ
  10. बार-बार ज़ियारत की तौफ़ीक
  11. क़यामत के दिन इमाम हुसैन (अ) की शफ़ाअत की दुआ

आख़िर में यह संदेश दिया गया है कि ज़ियारत-ए-आशूरा के ये गहरे अर्थ हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को प्रभावित करें, हम हुसैनी जीवन जिएँ, अहलेबैत के मार्ग पर रहें और हमारा रिश्ता उनसे दुनिया और आख़िरत में कभी न टूटे।

अल्लाह से दुआ है कि इमाम-ए-ज़माना (अ) के ज़हूर में जल्दी करे और सभी शहीदों पर अल्लाह की रहमत हो।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha