शुक्रवार 19 जून 2026 - 14:04
ज़ियारत-ए-आशूरा | ज़ालिम लोग लानत के हक़दार क्यों हैं?

ज़ियारत-ए-आशूरा में “लानत” का मतलब गाली देना नहीं है, बल्कि ज़ालिमो को अल्लाह की रहमत से दूर करने की दुआ करना है। यह लेख बताता है कि किस तरह अहले-बैत (अ) से खिलाफत छीन लेना, उनके विरुद्ध सभी अपराधों की शुरुआत और उम्मत को हिदायत से वंचित करने की बुनियाद बना।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मुहर्रम के आगमन के साथ इस एजेंसी ने “ज़ियारत-ए-आशूरा” पर एक विशेष फाइल प्रकाशित की है और हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन जवाद मुहद्दिसी की उपस्थिति में इस ज़ियारत की व्याख्या का सिलसिला शुरू किया है, ताकि अहले-बैत (अ) के ज्ञान के लिए एक नया द्वार खोला जा सके। यह विशेष प्रस्तुति इमाम हुसैन (अ) के वफादार अज़ादारों को समर्पित है।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

اَلسَّلامُ عَلَیْکَ یا اباعبدالله وَعَلَی الاَْرْواحِ الَّتی حَلَّتْ بِفِناَّئِکَ अस्सलामो अलैका या अबा अब्दिल्लाह व अला अरवाहिल लति हल्लत बेफ़िनाएक

सलाम और दरूद उन सभी पर जो अहले-बैत और इमाम हुसैन (अ) से मोहब्बत रखते हैं और उनके ग़म में शामिल हैं।

ज़ियारत-ए-आशूरा के इस हिस्से की व्याख्या में कहा गया:

فَلَعَنَ اللهُ اُمَّةً اَسَّسَتْ اَساسَ الظُّلْمِ وَالْجَوْرِ عَلَیْکُمْ اَهْلَ الْبَیْتِ وَلَعَنَ اللهُ اُمَّةً دَفَعَتْکُمْ عَنْ مَقامِکُمْ، وَاَزالَتْکُمْ عَنْ مَراتِبِکُمُ الَّتی رَتَّبَکُمُ اللهُ فیها “फ़लाअनल्लाहो उम्मतन अस्ससत असासज़्ज़ुल्म वल-जौर अलैकुम अहलल-बैत व लअनल्लाहु उम्मतन दफअत्कुम अन मकामिकुम व अज़ालतकुम अन मरातेबेकोमुल्लति रत्तबकोमुल्लाह फ़ीहा…”

इस “लानत” का अर्थ उन लोगों के लिए अल्लाह की लानत की दुआ करना है जिन्होंने अहले-बैत (अ) पर ज़ुल्म की नींव रखी। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि यहाँ “लानत” का मतलब गाली-गलौज नहीं है, बल्कि यह दुआ है कि ऐसे लोग अल्लाह की रहमत से दूर कर दिए जाएँ और उसकी विशेष कृपा से वंचित हों।

जैसे “सलाम” किसी के लिए भलाई और दुआ का इज़हार है, वैसे ही “लानत” उसके विपरीत, बुरे कर्मों और गलत रास्ते पर चलने वालों से नफरत और उनके कर्मों की निंदा का इज़हार है। इसलिए यदि कोई “लानत” पर सवाल उठाए, तो समझना चाहिए कि यह वास्तव में अत्याचार की निंदा और उसे अल्लाह की रहमत से दूर करने की दुआ है।

क़ुरआन में अल्लाह ने कई जगह काफिरों, मुनाफिकों और अत्याचारियों पर लानत की है, जैसे “लुइनू बिमा क़ालू”, “मलऊनीन ऐनमा सुकिफ़ू”, और “लअनतुल्लाह अलल-काज़िबीन”। यहाँ तक कि शैतान को भी “लईन” यानी अल्लाह की रहमत से दूर बताया गया है। इसी आधार पर आज के नारे जैसे “अमेरिका मुर्दाबाद” या “इज़राइल मुर्दाबाद” भी उसी अवधारणा की व्याख्या हैं।

अहले-बैत से खिलाफत छीनने से शुरू होने वाला ज़ुल्म

ज़ियारत-ए-आशूरा में जब कहा जाता है कि उस उम्मत पर लानत जिसने अहले-बैत पर ज़ुल्म की बुनियाद रखी, तो यह इतिहास की जड़ों की ओर इशारा है। अहले-बैत पर होने वाले अत्याचार की शुरुआत वहीं से हुई जहाँ पैग़म्बर (स) की वसीयत को लागू होने से रोका गया।

उन्होंने एक “बातिल उम्मत” की नींव रखी। “उम्मत” का मतलब एक संगठित समूह होता है, चाहे वह हक़ पर हो या बातिल पर। जिन्होंने योजनाबद्ध तरीके से अहले-बैत के अधिकार छीने और उन्हें उनके इलाही मक़ाम से हटाया, वही बातिल उम्मत थी।

ये घटनाएँ केवल उसी समय तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आज तक उनका असर मौजूद है और क़यामत तक रहेगा।

पैग़म्बर (स) के बाद साक़ीफ़ा जैसी घटनाएँ, हदीस लिखने पर रोक, यहाँ तक कि पैग़म्बर से क़लम और काग़ज़ छीनने की घटना, और फिर अमीरुल मोमिनीन अली (अ) की शहादत—ये सब उसी सिलसिले की कड़ियाँ हैं जिसमें अहले-बैत को उनके वास्तविक नेतृत्व से दूर किया गया।

इस प्रकार अत्याचार की नींव रखी गई और उसका प्रभाव सदियों तक जारी रहा।

ज़ियारत-ए-आशूरा का महत्वपूर्ण संदेश

“व लअना अल्लाहु उम्मतन दफअत्कुम अन मकामिकुम…”

अर्थात अल्लाह उस उम्मत पर लानत करे जिसने आपको आपके स्थान से हटाया और उन ऊँचे दर्जों से वंचित किया जो अल्लाह ने आपके लिए निर्धारित किए थे।

यह सभी उन लोगों पर लागू होता है जिन्होंने अहले-बैत के ईश्वरीय स्थान को छीनकर अत्याचार की नींव रखी।

पहला बड़ा अन्याय: उम्मत को इमामत से वंचित करना

सहीफ़ा सज्जादिया की 48वीं दुआ में भी इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) इसी हकीकत की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि अल्लाह ने अपने खलीफ़ाओं और चुने हुए बंदों के लिए जो ऊँचे स्थान निर्धारित किए थे, उन्हें उनसे छीन लिया गया।

जुमे, ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा जैसी नमाज़ें शासन और नेतृत्व से जुड़ी थीं, लेकिन उन्हें उन लोगों ने संभाल लिया जिनका इस पद से कोई संबंध नहीं था। इस प्रकार सबसे बड़ा अन्याय यह था कि उम्मत को अहले-बैत की इमामत से वंचित कर दिया गया।

नतीजा यह है कि जिन्होंने अहले-बैत को उनके स्थान से हटाया, वे वास्तव में लानत के हक़दार हैं, क्योंकि उन्होंने इस्लाम की उम्मत पर बहुत बड़ा ज़ुल्म किया।

आशा है कि हम अहले-बैत की विलायत का हक़ अदा करें और अपने जीवन के हर पहलू में उनके रास्ते पर चलें, क्योंकि हमारी सफलता और नजात इसी में है।

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