हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , तेहरान के जामे मस्जिद अल-ज़हरा (स.अ.) के इमाम-ए-जमाअत और अंतरराष्ट्रीय प्रचारक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली नूरी सुल्तान ने अपने एक लेख में शहीद इमाम के अंतिम विदाई समारोह के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया।
उन्होंने लिखा कि युद्ध की परिस्थितियों के कारण अंतिम संस्कार में देरी होने से यह आशंका थी कि समय बीतने के साथ लोगों के दुख और भावनाएँ कम हो जाएँगी, लेकिन चार महीने बाद आयोजित अंतिम विदाई में करोड़ों लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी और गहरे भावनात्मक जुड़ाव ने इस आशंका को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।
उन्होंने कहा कि यह दृश्य इस बात का प्रमाण है कि लोगों के दिलों में परिवर्तन और जागृति केवल अल्लाह की इच्छा से होती है। बाहरी तौर पर अंतिम विदाई का वातावरण शोक और आँसुओं से भरा था, लेकिन वास्तव में यही संघर्ष और बलिदान ईश्वरीय सहायता की भूमिका तैयार करता है।
उनके अनुसार अल्लाह की मदद केवल उन लोगों को मिलती है जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य के मार्ग पर डटे रहते हैं। उन्होंने कुरआन की आयत "लैस लिल इंसान इल्ला मा स'आ" का हवाला देते हुए कहा कि इंसान को वही मिलता है जिसके लिए वह प्रयास करता है।
नूरी सुल्तान ने कहा कि शहीद इमाम का अंतिम संस्कार केवल एक शोक सभा नहीं था, बल्कि यह प्रतिरोधी मोर्चे की निकट आती विजय और ईश्वरीय सहायता का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि भौतिक सोच रखने वाले लोग इन घटनाओं को केवल हार और निराशा के रूप में देखते हैं, जबकि ईश्वरीय दृष्टिकोण से यही कठिनाइयाँ भविष्य की बड़ी सफलताओं की भूमिका बनती हैं। उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के अंतिम वर्षों और इमाम खुमैनी (र.) के ऐतिहासिक बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भी कई लोगों ने संघर्ष को असफल बताया था, लेकिन बाद की घटनाओं ने इन धारणाओं को गलत साबित कर दिया।
उन्होंने आगे लिखा कि इतिहास गवाह है कि ईश्वरीय सहायता अक्सर ऐसे समय और ऐसे स्थान पर प्रकट होती है जिसकी सामान्य बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती।
उन्होंने इराक का उदाहरण देते हुए कहा कि कभी कोई यह नहीं सोच सकता था कि यही देश आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े जनाज़ा और अज़ादारी के आयोजनों का केंद्र बनेगा। उनके अनुसार यह सब इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह सत्य के मोर्चे की सहायता अपनी निर्धारित योजना के अनुसार करता है, न कि केवल इंसानी विश्लेषणों के आधार पर।
अंत में उन्होंने मुसलमानों से आह्वान किया कि वे ईश्वरीय सहायता की प्रतीक्षा केवल भविष्यवाणियों और राजनीतिक विश्लेषणों के आधार पर न करें, बल्कि अपने संघर्ष, धैर्य और त्याग को मजबूत करें। उन्होंने कहा कि शहीद इमाम का पवित्र लहू उगती हुई सुबह की तरह विजय और सफलता का संदेश देता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने कुरआन की आयत "अलैसस्सुब्हु बि-क़रीब" (क्या सुबह निकट नहीं है?) का उल्लेख करते हुए विश्वास जताया कि सत्य और प्रतिरोध की अंतिम जीत अवश्य होगी।
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