गुरुवार 16 जुलाई 2026 - 23:16
ख़िताबत का मापदंड!

ख़िताबत केवल बोलने का नाम नहीं, बल्कि दिलों को जगाने की कला है। एक खतीब की महानता उसकी ऊँची आवाज़ से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से कि उसके शब्द श्रोताओं के दिल और दिमाग़ में कितनी गहराई से उतरते हैं। वह केवल ज़ुबान से नहीं बोलता, बल्कि अपने ज्ञान, चिंतन, निष्ठा, चरित्र, गरिमा और तर्क के माध्यम से संवाद करता है।

लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी। ख़िताबत केवल बोलने का नाम नहीं, बल्कि दिलों को जगाने की कला है। एक खतीब की महानता उसकी ऊँची आवाज़ से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से कि उसके शब्द श्रोताओं के दिल और दिमाग़ में कितनी गहराई से उतरते हैं। वह केवल ज़ुबान से नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, चिंतन, निष्ठा, चरित्र, गरिमा और तर्क के बल पर बात करता है।

इसीलिए अलंकार और वक्तृत्वशास्त्र के विद्वानों ने कहा है कि सबसे अच्छा वक्ता वह नहीं होता जो सबसे ऊँची आवाज़ में बोले, बल्कि वह होता है जिसकी बात सबसे अधिक समय तक याद रखी जाए।

आवाज़ खिताबत का साधन है, उद्देश्य नहीं

उसकी सुंदरता चिल्लाने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, संतुलन, सही उच्चारण, उचित विराम और स्वाभाविक उतार-चढ़ाव में है। यदि कोई शब्द सही लहजे में बोला जाए तो वह दिल पर गहरी छाप छोड़ देता है, लेकिन यदि वह शोर में खो जाए तो अपना प्रभाव खो बैठता है।

जब माइक्रोफ़ोन और लाउडस्पीकर नहीं थे, तब ऊँची आवाज़ समय की आवश्यकता थी। वक्ता खुले मैदानों, मस्जिदों और बड़े जनसमूहों में अपनी स्वाभाविक आवाज़ के सहारे हज़ारों लोगों तक अपना संदेश पहुँचाता था।

उस समय ऊँची आवाज़ में बोलना मजबूरी थी, कला नहीं।

आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। एक छोटा-सा माइक्रोफ़ोन अंतिम पंक्ति तक भी आवाज़ को साफ़ और स्पष्ट पहुँचा देता है। अब वक्ता की कुशलता इस बात में नहीं है कि वह कितनी ज़ोर से बोलता है, बल्कि इस बात में है कि वह माइक्रोफ़ोन का उपयोग करते हुए कितनी सुंदरता और प्रभावशीलता से अपनी बात रखता है।

माइक्रोफ़ोन आवाज़ को बढ़ाने के लिए है, वक्ता को चिल्लाने पर मजबूर करने के लिए नहीं।

इसके बावजूद आज भी कुछ मंचों पर ऐसा लगता है मानो वक्ता किसी विशाल मैदान में बिना माइक्रोफ़ोन के भाषण दे रहा हो। सभा में केवल चार लोग बैठे होते हैं, लेकिन आवाज़ ऐसी गूँजती है जैसे सामने हज़ारों लोगों की भीड़ हो।

कभी शब्द सुनाई देने के बजाय केवल शोर महसूस होता है, और कभी चेहरे के अस्वाभाविक भाव, आवश्यकता से अधिक खुला हुआ मुँह और अनावश्यक शारीरिक हाव-भाव श्रोताओं का ध्यान विषय से हटा देते हैं।

उस समय ज्ञान पीछे छूट जाता है और प्रस्तुत करने का तरीका ही चर्चा का विषय बन जाता है।

जबकि वक्तृत्व कला की बुनियाद इसके बिल्कुल विपरीत है। तजवीद का ज्ञान अक्षरों के सही उच्चारण की शिक्षा देता है, ध्वनिविज्ञान आवाज़ को संतुलित रखने का पाठ पढ़ाता है, और अलंकारशास्त्र बताता है कि प्रभाव का रहस्य शब्दों के चयन, वाक्यों की सही व्यवस्था और उपयुक्त लहजे में छिपा होता है। इनमें से किसी भी विद्या ने शोर को वक्तृत्व की सुंदरता नहीं माना है।

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम) की वाणी इस कला का पूर्ण आदर्श थी। आप अत्यंत स्पष्ट, संतुलित और गरिमापूर्ण ढंग से बोलते थे। प्रत्येक शब्द अपने उचित स्थान पर होता था और हर वाक्य अपने पूरे अर्थ के साथ लोगों के दिलों में उतर जाता था। आपने कभी ऊँची आवाज़ के बल पर नहीं, बल्कि सत्य, बुद्धिमत्ता और श्रेष्ठ अभिव्यक्ति के माध्यम से लोगों के दिल जीते।

इसी प्रकार अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के ख़ुत्बे आज भी 'नहजुल बलाग़ा' के रूप में जीवित हैं। उनकी महानता उनकी ऊँची आवाज़ में नहीं, बल्कि उनके ऊँचे विचारों में है। यदि शोर ही प्रभाव का मापदंड होता, तो इतिहास तर्कपूर्ण भाषणों को नहीं, केवल ऊँची आवाज़ों को याद रखता।

यदि ऊँची आवाज़ ही वक्तृत्व का मापदंड होती, तो चौदह सौ वर्ष बाद दुनिया हज़रत ज़ैनब (सलामुल्लाह अलैहा) के ख़ुत्बों को नहीं, बल्कि उनकी आवाज़ की ऊँचाई को याद रखती। लेकिन इतिहास ने उनकी आवाज़ नहीं, बल्कि उनके विचार, तर्क, साहस और सत्यनिष्ठा को सुरक्षित रखा।

मनोविज्ञान भी यही कहता है कि लगातार एक ही ऊँची आवाज़ श्रोता को थका देती है, जबकि संतुलित लहजा, उचित विराम, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और अवसर के अनुसार मौन, किसी भाषण को यादगार बना देते हैं। सबसे अच्छा वक्ता वह है जो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखे, न कि भावनाएँ उस पर हावी हो जाएँ।

अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) का मिम्बर ज्ञान का मिम्बर है, संस्कृति और शिष्टता का मिम्बर है, और बुद्धिमत्ता का मिम्बर है। यहाँ से निकला हर शब्द ईमान को मज़बूत करे, बुद्धि को प्रकाशित करे और चरित्र को श्रेष्ठ बनाए। इस मिम्बर की महानता शोर से नहीं बढ़ती; बल्कि ज्ञान, तर्क, निष्ठा और चरित्र से बढ़ती है।

इसलिए समय की माँग है कि आज हमारे ख़तीबों और ज़ाकिरों को अपनी आवाज़ से अधिक अपने बोलने के ढंग और शैली पर मेहनत करने की आवश्यकता है। माइक्रोफ़ोन के होते हुए चिल्लाना कोई कला नहीं, बल्कि कमजोरी है। आवश्यकता से अधिक मुँह खोलना अभिनय है, वक्तृत्व नहीं। वास्तविक उत्कृष्टता यह है कि श्रोता शांत बैठा रहे, लेकिन उसके दिल में मानो एक क्रांति आ जाए; उसकी आँखें नम हो जाएँ, उसकी बुद्धि जागृत हो जाए और उसके जीवन की दिशा बदल जाए।

वक्तृत्व की श्रेष्ठता ऊँची आवाज़ में नहीं, बल्कि ऊँचे विचारों में है। प्रभावशाली अभिव्यक्ति चीख़-पुकार से नहीं, बल्कि ज्ञान, तर्क, बुद्धिमत्ता और निष्ठा से जन्म लेती है। जब शब्द दिल से निकलते हैं, तो वे माइक्रोफ़ोन के सहारे नहीं, बल्कि सीधे लोगों के दिलों में उतर जाते हैं। यही मिम्बर की गरिमा है और यही अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) के संदेश की वास्तविक आत्मा है।

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