हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अंजुमन-ए-शरई शियान जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सय्यद हसन मूसवी ने शादी-विवाह के समारोहों में बढ़ती गैर-जरूरी रस्मों, फिजूलखर्ची और दिखावे पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए समाज में गंभीर सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शादी को आसान, सम्मानजनक और इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, ताकि यह खुशी का अवसर आर्थिक बोझ और सामाजिक दबाव का कारण न बने।
केंद्रीय इमामबाड़ा बडगाम में नमाज़-ए-जुमा के दौरान संबोधित करते हुए आगा सय्यद हसन ने कहा कि निकाह एक प्राकृतिक और शरीअत के अनुसार जरूरी रिश्ता होने के साथ-साथ शांति, पवित्रता, पारिवारिक स्थिरता तथा आध्यात्मिक और नैतिक जीवन का महत्वपूर्ण साधन है। हालांकि, गैर-जरूरी रस्मों और अनुचित खर्चों ने शादी जैसे पवित्र रिश्ते को आम परिवारों के लिए मुश्किल बना दिया है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम ने निकाह के लिए एक सरल, संतुलित और सम्मानजनक तरीका बताया है, लेकिन समय के साथ विभिन्न सामाजिक रस्मों, गैर-जरूरी खर्चों और दिखावे की होड़ ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। विशेष रूप से मध्यम और गरीब परिवारों को इन रस्मों को पूरा करने के लिए भारी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है और कई बार उन्हें कर्ज लेने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है।
आगा सय्यद हसन ने कहा कि शादी परिवारों को जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, उन्हें कर्ज और आर्थिक परेशानी में डालने का नहीं। उन्होंने समाज से अपील की कि ऐसी सभी रस्मों और सामाजिक अपेक्षाओं पर दोबारा विचार किया जाए, जिनका कोई धार्मिक आधार नहीं है और जो केवल सामाजिक प्रतिस्पर्धा, दिखावे तथा पारिवारिक हैसियत के प्रदर्शन का माध्यम बन चुकी हैं।
उन्होंने माता-पिता और परिवारों से अपील की कि बच्चों की शादी को गैर-जरूरी खर्च और सामाजिक प्रतिस्पर्धा का मैदान न बनाया जाए। उन्होंने कहा कि शादी की वास्तविक महानता धन के प्रदर्शन में नहीं, बल्कि ईमान, अच्छे चरित्र, आपसी सम्मान, सादगी और इस्लामी मूल्यों में है।
आगा सय्यद हसन ने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) और हज़रत इमाम अली (अ) के निकाह का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पवित्र हस्तियों का वैवाहिक जीवन मुसलमानों के लिए सादगी, संतोष और इस्लामी मूल्यों का एक उज्ज्वल उदाहरण है। उन्होंने जोर दिया कि अहले बैत (अ) की सीरत से मार्गदर्शन लेते हुए शादी-विवाह के समारोहों को गैर-जरूरी रस्मों और परंपराओं से मुक्त किया जाना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम इंसान की प्राकृतिक आवश्यकताओं का विरोध नहीं करता, बल्कि उन्हें एक जायज़, पवित्र और सम्मानजनक दायरे में पूरा करने का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि निकाह इंसान के जीवन में धार्मिक, नैतिक, मानसिक और सामाजिक स्थिरता का महत्वपूर्ण साधन है।
अंजुमन-ए-शरई शियान के अध्यक्ष ने उलेमा, माता-पिता, बुजुर्गों और समाज के जिम्मेदार लोगों पर जोर दिया कि वे सामूहिक रूप से ऐसी रस्मों की हतोत्साहित करें, जो निकाह को अनावश्यक रूप से मुश्किल बनाती हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक स्थिति को शादी की राह में बाधा नहीं बनने देना चाहिए और निकाह को आसान बनाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने नई पीढ़ी के सामने मौजूद नैतिक और सामाजिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बेवजह की भौतिक अपेक्षाओं, दिखावे और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के नकारात्मक प्रभावों से युवा पीढ़ी को सुरक्षित रखने के लिए परिवारों और समाज को व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
आगा सय्यद हसन ने जोर देकर कहा कि शादी-विवाह के मामलों में वास्तविक सुधार केवल भाषणों और चर्चाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परिवारों को व्यावहारिक रूप से सादगी, संतुलन और इस्लामी मूल्यों को अपनाना होगा।
उन्होंने कहा कि निकाह को आसान बनाया जाए, मुश्किल नहीं। शादी-विवाह के समारोहों से गैर-जरूरी रस्मों, फिजूलखर्ची और दिखावे को खत्म करके उन्हें सादगी, गरिमा और धार्मिक मूल्यों का प्रतीक बनाया जाना चाहिए।
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