रविवार 27 सितंबर 2026 - 12:48
इस्तिकामत हक़ की राह पर मज़बूती और दुश्मन की साजिशों को नाकाम करने का नाम हैं।हुज्जतुल इस्लाम सैयद मुर्तज़ा हाशमी

हौज़ा / हुज्ज़तुल इस्लाम सैयद मुर्तज़ा हाशमी ने कहा कि हक़ की राह पर दृढ़ता से कायम रहना इंसान की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कुरआन की शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि लक्ष्य पर मज़बूत ईमान, अल्लाह से गहरा संबंध, सब्र और निरंतर प्रयास इंसान को कठिन परिस्थितियों में भी अपने रास्ते पर कायम रखते हैं और दुश्मनों की साजिशों को नाकाम बनाने में मदद करता हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद मुर्तज़ा हाशमी ने कहा कि इस्तिकामत यानी सही और हक़ की राह पर मज़बूती से कायम रहना इंसान की व्यक्तिगत और सामाजिक जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि कुरआन में इस्तिकामत का बार-बार उल्लेख हुआ है और यह इंसान को कठिन परिस्थितियों में अपने लक्ष्य से भटकने से बचाती है। इसके लिए लक्ष्य पर ईमान, अल्लाह की सही पहचान और उसके साथ मज़बूत संबंध आवश्यक हैं।

उन्होंने दुश्मनों की साजिशों को नाकाम करने में इस्तिकामत के महत्व पर कुरआन की आयत 
إِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا لَا یَضُرُّکُمْ کَیْدُهُمْ شَیْئًا
का हवाला देते हुए कहा कि सब्र, तक़वा और दृढ़ता दुश्मन की चालों को बेअसर करने का माध्यम बनते हैं। उन्होंने कहा कि कुरआन इस्तिकामत को जीवन में आसानी और नेमतों की वृद्धि से भी जोड़ता है। सूरह जिन्न की आयत «وَأَن لَّوِ اسْتَقَامُوا عَلَی الطَّرِیقَةِ لَأَسْقَیْنَاهُم مَّاءً غَدَقًا» के बारे में उन्होंने बताया कि इसकी तफ्सीर में प्रचुरता और जीवन में कुशादगी की ओर संकेत किया गया है।

सैयद मुर्तज़ा हाशमी ने कहा कि इंसान का इम्तिहान केवल मुश्किल समय में नहीं होता, बल्कि नेमत, ताकत और सुविधाएं मिलने के बाद भी होता है। उन्होंने कहा कि इंसान को भटकाने वाले कारण दो प्रकार के होते हैं आंतरिक और बाहरी। धन-दौलत की लालसा, सांसारिक इच्छाएं और नफ़्स की चाहतें आंतरिक कारण हैं, जबकि दुश्मनों की साजिशें और अत्याचारी शक्तियां बाहरी कारणों में शामिल हैं। उन्होंने जोर दिया कि अल्लाह की मदद केवल इच्छा करने से नहीं मिलती, बल्कि सही लक्ष्य के साथ मेहनत, संघर्ष और लगातार प्रयास भी ज़रूरी है।

उन्होंने कहा कि इस्तिकामत का संबंध केवल उपलब्ध संसाधनों से नहीं है। जब संसाधन सीमित हो जाते हैं, तब इंसान की वास्तविक दृढ़ता सामने आती है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य पर मजबूत ईमान इस्तिकामत का पहला आधार है और अल्लाह की शक्ति पर भरोसा इंसान को डर और संदेह से बचाता है। इसके अलावा दूसरों की आलोचना और निंदा का डर भी इंसान को हक़ की राह से रोक सकता है। कुरआन में ऐसे लोगों की प्रशंसा की गई है जो «وَلَا یَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ» यानी किसी निंदा करने वाले की निंदा से नहीं डरते।

उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) के साथियों, सलमान फ़ारसी और अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) की सीरत का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्तिकामत केवल नेतृत्व की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की जिम्मेदारी है। कुरआन में «فَاسْتَقِمْ کَمَا أُمِرْتَ وَمَن تَابَ مَعَکَ» के माध्यम से पैग़म्बर (स.ल.) और उनके साथियों दोनों को दृढ़ रहने का आदेश दिया गया है।

उन्होंने कहा कि हज़रत अली (अ.स.) की सीरत में भी हक़ पर अडिग रहने की मिसाल मिलती है। उनकी नीति धोखे और चालबाजी पर आधारित नहीं थी; वे ऐसे रास्ते को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे जो हक़ और ईश्वरीय कर्तव्य के विरुद्ध हो। इसलिए वास्तविक इस्तिकामत का अर्थ है कि कठिन परिस्थितियों में भी इंसान अपने सिद्धांतों और ईश्वरीय जिम्मेदारी से पीछे न हटे।

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