हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अंजुमन-ए-शरई शियान जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष हुज्जतुल वल-मुस्लिमीन आग़ा सय्यद हसन मूसवी सफ़वी ने केंद्रीय इमामबारगाह बडगाम में जुमे के ख़ुत्बे से ख़िताब करते हुए कहा कि इंसान की इन्फ़िरादी और इज्तिमाई गुमराही की बुनियादी वजह आख़िरत से ग़फ़लत और दुनिया की बेजा मुहब्बत है। उन्होंने कहा कि कुरआन-ए-मजीद बार-बार इंसान को क़यामत, हिसाब-ओ-किताब और अब्दी ज़िंदगी की याद दिलाता है, मगर अफ़सोस कि दुनिया की आरज़ी आसाइशों ने इंसान को उसके असली मकसद-ए-हयात से ग़ाफ़िल कर दिया है।
उन्होंने कुरआन-ए-करीम की कई आयतों की रौशनी में वाज़ेह किया कि दुनिया अपने आप में मज़्मूम नहीं है, बल्कि दुनियापरस्ती वह ख़तरनाक बीमारी है जो इंसान को हक़, अद्ल और ख़ुदा की इताअत से दूर कर देती है। उन्होंने कहा कि जब इंसान की तमाम प्राथमिकता दुनियावी मफ़ादात के गिर्द घूमने लगें तो वह अपनी पैदाइश के मकसद, यानी बंदगी-ए-इलाही, को फ़रामोश कर बैठता है और यही तर्ज़-ए-फ़िक्र माशिरती, अख़लाक़ी और रूहानी ज़वाल का सबब बनता है।
आग़ा सय्यद हसन मूसवी सफ़वी ने वाक़ए-ए-कर्बला को दुनियापरस्ती और हक़परस्ती के दरमियान फ़ैसलाकुन मारिका करार देते हुए कहा कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने अपनी अज़ीम क़ुर्बानी के ज़रीए इंसानियत को यह पैग़ाम दिया कि ईमान, हक़ और दीन की हिफ़ाज़त के लिए हर क़ुर्बानी दी जा सकती है, लेकिन दुनियावी मुनाफ़े की ख़ातिर हक़ का सौदा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि तारीख़-ए-कर्बला के किरदार इस हक़ीक़त के आईना-दार हैं कि दुनिया की मुहब्बत इंसान को बातिल का आला-ए-कार बना देती है, जबकि आख़रत पर यक़ीन और ख़ुदा पर तवक्कुल इंसान को इज़्ज़त, इस्तिक़ामत और अब्दी कामयाबी अता करता है।
उन्होंने कहा कि मोमिन की हक़ीक़ी शिनाख़्त यह है कि वह हर अमल से पहले रोज़-ए-जज़ा को पेश-ए-नज़र रखे, अपने आमाल का मुहासबा करे और अपनी ज़िंदगी को कुरआन व अहले-बैत (अ) की तालीमात के मुताबिक़ उस्तुवार करे। उन्होंने ज़ोर दिया कि माशिरे में दीनी मारिफ़त, तक़वा, अख़लाक़-ए-हसना और सीरत-ए-अहले-बैत (अ) को फ़रोग़ देना वक़्त की अहम तरीन ज़रूरत है, ताकि नई नस्ल दुनियापरस्ती, माद्दापरस्ती और फ़िक्री इन्हिराफ़ से महफ़ूज़ रह सके।
अंजुमन-ए-शरई शियान के अध्यक्ष ने कहा कि इंसान की असली कामयाबी माल-ओ-दौलत या दुनियावी इक़्तिदार में नहीं है, बल्कि ईमान, अमल-ए-सालेह, हक़ की नुसरत और सब्र-ओ-इस्तिक़ामत में मज़मर है। उन्होंने सूर-ए-अस्र की रौशनी में इस हक़ीक़त को उजागर किया कि ख़सारे से नजात सिर्फ़ उन्हीं लोगों को हासिल होती है जो ईमान लाते हैं, नेक आमाल अंजाम देते हैं, हक़ की तलक़ीन करते हैं और सब्र की तलक़ीन करते हैं।
जुमे के ख़ुत्बे के इख़्तिताम पर आग़ा सय्यद हसन मूसवी सफ़वी ने आलम-ए-इस्लाम, ख़ुसूसन ईरान, लुबनान, फ़लस्तीन, ग़ज़्ज़ा, यमन और इराक़ के मज़लूम अवाम, मुजाहिदीन-ए-इस्लाम और दीनी मराकिज़ व मराजे-ए-एज़ाम की सलामती, इज़्ज़त और कामयाबी के लिए ख़ुसूसी दुआएँ कीं। उन्होंने उम्मत-ए-मुस्लिमा के दरमियान इत्तिहाद, उख़ुव्वत और बाहमी हमआहंगी के फ़रोग़ की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि मौजूदा हालात में ईमान, बसीरत और वहदत ही उम्मत की ताक़त और कामयाबी की ज़मानत हैं।
उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला तमाम अहले-ईमान को दुनियापरस्ती से महफ़ूज़ रखे, ईमान व तक़वा में इस्तिक़ामत अता फ़रमाए, कुरआन व अहले-बैत (अ) की तालीमात पर अमल की तौफ़ीक़ नसीब करे और पूरी इंसानियत को अमन, अद्ल और हिदायत की नेअमत से सरफ़राज़ फ़रमाए।
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