हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह महमूद रजब़ी ने कहा कि हौज़ा-ए-इल्मिया की जिम्मेदारी केवल धार्मिक उलूम की शिक्षा देना नहीं है, बल्कि समाज का निर्माण करना और लोगों को गुमराही से बचाना भी है। आज की दुनिया की नई जरूरतों का जवाब देने के लिए फिक़्ह में विशेषज्ञता हासिल करना जरूरी है।
हौज़ा-ए-इल्मिया के उच्च शिक्षा केंद्र में प्रबंधकों और शिक्षकों के प्रशिक्षण के नए शैक्षणिक वर्ष के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए आयतुल्लाह रजब़ी ने सूरह तौबा की आयत-ए-नफ़र को हौज़ा-ए-इल्मिया की जिम्मेदारियों का एक महत्वपूर्ण घोषणापत्र बताया। उन्होंने कहा कि धर्म की गहरी समझ हासिल करने के लिए अरबी साहित्य, तर्कशास्त्र, दर्शन और अन्य बुनियादी विषयों को सही तरीके से सीखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि केवल धर्म को समझ लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने का तरीका सीखना भी जरूरी है। एक प्रचारक को अपने श्रोताओं की जरूरतों, संस्कृति, बौद्धिक स्तर और परिस्थितियों को अच्छी तरह समझना चाहिए, ताकि वह प्रभावी ढंग से धार्मिक शिक्षाओं को लोगों तक पहुंचा सके।
आयतुल्लाह रजब़ी ने कहा कि आयत-ए-नफ़र का मूल उद्देश्य समाज में सुधार और उसका निर्माण करना है। शिक्षक और प्रचारक को सबसे पहले स्वयं धर्म के प्रति जिम्मेदारी का एहसास और अल्लाह का भय पैदा करना चाहिए, क्योंकि केवल जानकारी पहुंचा देना सुधार और प्रशिक्षण नहीं है। उन्होंने शिक्षक को केवल जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि प्रशिक्षण देने वाला व्यक्ति बताया।
उन्होंने तक़वा को व्यक्ति और समाज को गुमराही से बचाने की बुनियादी शर्त बताते हुए कहा कि तक़वे की कमी इंसान को फैसलों में गलती करने, अल्लाह की सुन्नतों को भूलने और गैरुल्लाह के भय में लिप्त कर देती है। कुरआन के अनुसार, तक़वा इंसान के लिए कठिनाइयों से निकलने का रास्ता पैदा करता है। उन्होंने आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी की दो महत्वपूर्ण नसीहतों का उल्लेख करते हुए इख़लास के साथ अमल करने और प्रतिदिन अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम से सच्चा तवस्सुल करने पर जोर दिया।
आयतुल्लाह रजब़ी ने कहा कि वर्तमान दौर की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिक़्ह को विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता की ओर ले जाना जरूरी है। हर क्षेत्र में विशेषज्ञ फक़ीह ही उससे संबंधित समस्याओं का गहरा और सही समाधान पेश कर सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि कुरआन मानव विज्ञान के बेहद छोटे-छोटे विषयों के बारे में भी मार्गदर्शन देता है, लेकिन इन शिक्षाओं को कुरआन से प्राप्त करने के लिए पश्चिमी विचारधाराओं और उनके आधारों का आलोचनात्मक अध्ययन करना जरूरी है, ताकि सही ज्ञान और गलत विचारधाराओं के बीच अंतर स्पष्ट किया जा सके।
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