हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 1 अक्टूबर 2026 को 19 रबीउल सानी 1448 हिजरी को क़ुम मुक़द्दस के केंद्रीय कॉन्फ्रेंस हॉल अल-ग़दीर में यह सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें उलेमा, धार्मिक एवं राजनीतिक हस्तियों, प्रतिरोध आंदोलनों के प्रतिनिधियों और विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन क़ारी बशारत इमामी की तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक से हुई। इसके बाद शहज़ाद हुसैन ने नात-ए-रसूल-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम और शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह की याद में तराना-ए-शहादत पेश किया। वहीं ‘पयाम-ए-इस्लामी’ समूह ने फ़ारसी, अरबी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में तराने प्रस्तुत किए।
सम्मेलन के पहले वक्ता फ़िलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद के प्रतिनिधि नासिर अबू शरीफ़ थे। उन्होंने शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह के व्यक्तित्व, प्रशासनिक क्षमताओं और प्रतिरोध मोर्चे में उनकी भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्हें इस्लामी प्रतिरोध की प्रमुख हस्तियों में शामिल बताया।
उन्होंने प्रतिरोध आंदोलन को मजबूत बनाने और फ़िलिस्तीन के मुद्दे के समर्थन में शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह की भूमिका को रेखांकित किया तथा मुस्लिम उम्मत की एकता और एकजुटता एवं फ़िलिस्तीन के समर्थन के महत्व पर जोर दिया।
इस्लामी गणराज्य ईरान में यमन की क्रांतिकारी सरकार के राजदूत मोहम्मद इब्राहीम अल-दैलेमी ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने क्षेत्र की मौजूदा स्थिति, प्रतिरोध मोर्चे और शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह की भूमिका पर चर्चा करते हुए उनकी सेवाओं को श्रद्धांजलि दी।
मोहम्मद इब्राहीम अल-दैलेमी ने कहा कि फ़िलिस्तीन और मस्जिद-ए-अक्सा की रक्षा क्षेत्र के प्रतिरोध आंदोलनों के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
उन्होंने अंसारुल्लाह के बारे में लगाए गए कुछ आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह दावा सही नहीं है कि अंसारुल्लाह ख़ाना-ए-काबा या अन्य इस्लामी पवित्र स्थलों पर हमला करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा, “यह कैसे संभव है कि जो लोग मस्जिद-ए-अक्सा की रक्षा करते हैं, वे काबा पर हमला करें?”
यमनी राजदूत ने 2015 में यमन के खिलाफ शुरू की गई सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में पाकिस्तान के रुख का भी उल्लेख किया। उन्होंने इस अवसर पर मजलिस-ए-वहदत-ए-मुस्लिमीन पाकिस्तान की ओर से किए गए प्रयासों के लिए पाकिस्तानी जनता का आभार व्यक्त किया और इसे यमनी जनता के समर्थन में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
उन्होंने आगे कहा कि हालिया परिस्थितियों की शुरुआत से अब तक वे मजलिस-ए-वहदत-ए-मुस्लिमीन पाकिस्तान के महासचिव हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन राजा नासिर अब्बास जाफ़री के संपर्क में हैं और यमन से संबंधित मुद्दों तथा क्षेत्र की स्थिति को लेकर आपसी विचार-विमर्श जारी है।
सम्मेलन के अंतिम वक्ता दफ़्तर-ए-तबलीग़ात-ए-इस्लामी, हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के अनुसंधान विभाग के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन नजफ़ लक़ज़ाई थे।
उन्होंने शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं पर चर्चा करते हुए क़ुरआन की आयत “इन्नल्लाह युहिब्बुल्लज़ीना युक़ातिलूना फ़ी सबीलिहि सफ़्फ़न कअन्नहुम बुनयानुम मरसूस” के माध्यम से संगठित एकता और सामूहिक संघर्ष के महत्व को स्पष्ट किया।
उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से बलिदान और त्याग की भावना सराहनीय है, लेकिन इसी भावना को एक संगठित, सामूहिक और संस्थागत आंदोलन में बदलना एक कठिन चरण है।
हुज्जतुल इस्लाम लक़ज़ाई के अनुसार, शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह जैसी हस्तियों की प्रमुख विशेषताओं में यह क्षमता शामिल थी कि वे लोगों के ईमान, त्याग और बलिदान की भावना को इस्लामी उद्देश्यों और प्रतिरोध के मार्ग में एक संगठित और एकजुट आंदोलन का रूप दे सकें।
सम्मेलन में विभिन्न धार्मिक हस्तियों और प्रतिरोध आंदोलनों से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें आयतुल्लाह शेख़ हुसैन, हुज्जतुल इस्लाम अब्दुलमुहसिन अल-बक़शी और हौज़ा-ए-इल्मिया आले बैत के जिम्मेदार अधिकारी सहित अन्य हस्तियां शामिल थीं।
पाकिस्तान से भी विभिन्न धार्मिक हस्तियों, उलेमा और इस्लामी संगठनों के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में भाग लिया। पाकिस्तानी प्रतिनिधियों में आयतुल्लाह सय्यद शुजा हुसैनी, आयतुल्लाह शेख़ बाक़िर अल-मुक़द्दसी, शिया उलेमा काउंसिल पाकिस्तान के प्रतिनिधि, तहरीक-ए-बेदारी उम्मत-ए-इस्लामी के प्रतिनिधि तथा पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों से आए उलेमा और इस्लामी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
उल्लेखनीय है कि सम्मेलन के समापन पर मजलिस-ए-वहदत-ए-मुस्लिमीन, शाखा क़ुम के जिम्मेदार हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद ज़ीशान हैदर अल-हुसैनी ने उलेमा, धार्मिक एवं राजनीतिक हस्तियों, प्रतिरोध आंदोलनों के प्रतिनिधियों और विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधिमंडलों का आभार व्यक्त किया।
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