गुरुवार 8 अक्टूबर 2026 - 13:08
दुनिया मीनाब के 168 उज्ज्वल भविष्य की कर्जदार है

हौज़ा / काश कोई ऐसा हो जो एक ऐसा विमान बनाए, जो बमों की जगह आसमान से बच्चों के लिए खिलौने बरसाए और दुखी बड़ों के लिए थोड़ी-सी सांत्वना लेकर आए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,अब हमें यह स्वीकार करना होगा कि युद्ध आजकल ईरानियों की जीवनशैली का एक अप्रिय लेकिन बेहद महत्वपूर्ण शब्द बन चुका है। यह ऐसा शब्द है, जिसे जब भी इतिहास के पन्नों में देखते हैं तो पता चलता है कि इस धरती के दिल पर इसके गहरे और कभी न भरने वाले घाव हैं खुर्रमशहर पर कब्जे और राजधानी पर मिसाइल हमलों से लेकर सरदश्त पर बमबारी और देश के विभिन्न हिस्सों में हुए आतंकवादी हमलों तक।

मीनाब भी ऐसे ही न भरने वाले घावों में से एक है। यह उन घावों में शामिल है, जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे कभी पूरी तरह नहीं भरेंगे। शायद इसी वजह से इन दिनों जब मैं कैलेंडर के पन्ने पलटती हूं और बाल दिवस पर पहुंचती हूं, तो इन दिनों कही जा रही इस मार्मिक बात के बारे में सोचती हूं:काश बच्चे न मरते। काश उन्हें कुछ समय के लिए आसमान पर उठा लिया जाता, ताकि युद्ध खत्म होने के बाद वे सुरक्षित अपने घर लौटते और जब माता-पिता हैरानी से पूछते कि तुम कहां थे? तो वे खुशी से कहते हम सितारों के साथ खेल रहे थे।

या फिर उपन्यास ‘सोवेशून’ के पत्रकार मैकमैहन की तरह कोई कहता: काश कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो ऐसा विमान बनाए, जो बमों की जगह आसमान से बच्चों के लिए खिलौने बरसाए और दुखी बड़ों के लिए थोड़ी-सी सांत्वना लेकर आए!

लेकिन युद्ध एक चोर है खुशियों भरे दिनों का चोर, माता-पिता की आंखों से उम्मीद चुराने वाला चोर और बच्चों के चेहरों से मुस्कान छीन लेने वाला चोर! शायद आंकड़ों में शजर-ए-तय्यबा प्राथमिक विद्यालय के शहीदों की पहचान संख्या 168 के रूप में की जाती हो, लेकिन काश कोई हमें इंसानों को गिनना सिखाने वाला होता। हमने अपने घावों और आंसुओं को उन्हीं संख्याओं से मापना सीख लिया, जिनसे हम संतरे बेचने वाले की संतरे गिनते या गणित के सवाल हल करते थे। किसी ने हमें यह नहीं सिखाया कि संख्याओं के पीछे छिपा यह मूर्खतापूर्ण तर्क नोटों, आलू और प्याज गिनने के लिए है, इंसानों की जान गिनने के लिए नहीं!

इंसानों की जान को ‘दुनिया’ की इकाई में गिना जाना चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि हर एक जान के जाने के साथ कितने लोगों के लिए उनकी पूरी “दुनिया” खत्म हो जाती है?

अब मीनाब के कितने घरों में बच्चों की हंसी की आवाज़ हमेशा के लिए गायब हो गई है? कितनी माताओं के पास अब कोई ऐसा दुलारा नहीं है, जिसे वे रात में अपनी बाहों में लेकर सोएं और जिसके हर आने-जाने पर आयतुल कुर्सी पढ़कर उसकी सलामती की दुआ करें? कितने पिता अब उस लाडले से वंचित हो गए हैं, जिसकी लंबी उम्र की कामना करते हुए वे अपने बुढ़ापे की लाठी बनने का सपना देखते थे?

आज दक्षिणी ईरान में हुआ यह युद्ध 168 परिवारों के 168 उज्ज्वल भविष्य का कर्जदार है—उन दूल्हों के सूट और दुल्हनों की सफेद पोशाकों से लेकर, जो कभी पहनी नहीं जाएंगी; उन बचपन के सपनों तक, जो यादों में बदलने के बजाय हमेशा के लिए अधूरी इच्छाओं और पछतावे का रंग ले चुके हैं।

लेकिन हमेशा ताजा रहने वाले इन दुखों के पास एक बड़ी ताकत भी होती है—उन लोगों के सामने खड़े होने की प्रेरणा, जिन्होंने न केवल मीनाब बल्कि इस पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उम्मीद के दीपक को हमेशा के लिए बुझाने की कोशिश की। उन्हें शायद यह एहसास नहीं था कि आज केवल मीनाब के 168 शोकाकुल परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा ईरान उन बच्चों के नाम पहले से कहीं अधिक बुलंद आवाज़ में पुकार रहा है। लोगों ने उनके नामों को अपनी यादों में सुरक्षित कर लिया और उनकी स्मृति को अपने सीने में बसा लिया।

इतना ही नहीं, हर एक बच्चे को लोगों ने दफन नहीं किया, बल्कि उम्मीद के बीज की तरह मिट्टी में बो दिया, ताकि बहुत दूर नहीं, आने वाले भविष्य में उसी मिट्टी से उम्मीद अंकुरित हो और आने वाली पीढ़ी के बच्चों के रूप में फिर से जीवित हो उठे। कुछ वैसा ही, जैसा कवि क़ैसर अमीनपुरी की कविताओं में मिलता है। उन्होंने कहा था,वास्तविक जीत की उम्मीद—युद्ध में नहीं, बल्कि युद्ध पर हो। और उन्होंने यह भी लिखा था:मैं तुम्हारी बेचैन आंखों से वादा करता हूं कि हमारी जड़ें पानी तक और हमारी शाखाएं सूरज तक पहुंचेंगी; हम फिर से हरे-भरे हो जाएंगे!

दुनिया मीनाब के 168 उज्ज्वल भविष्य की कर्जदार है

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