गुरुवार 8 अक्टूबर 2026 - 22:29
शहीदों का खून कौमों को और अधिक जागरूक और एकजुट करता है

नेताओं की शहादत से “जागृत कौम का मिशन” कभी नहीं रुक सकता

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इस्लामी दुनिया में हो रहे बदलावों में कौमों की जागरूकता की भूमिका पर जोर देते हुए हिज़्बुल्लाह लेबनान की केंद्रीय परिषद के सदस्य शेख हसन बगदादी ने कहा कि आज क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, वह “इस्लामी उम्मत के लिए एक नए लक्ष्य” और मुस्लिम कौमों में जागरूकता, सामूहिक भागीदारी तथा एकता को बढ़ाने का कारण बन सकता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हिज़्बुल्लाह लेबनान की केंद्रीय परिषद के सदस्य शेख हसन बगदादी ने चौथे अंतरराष्ट्रीय वेबिनार “बअसते उम्मते मोहम्मद” को संबोधित करते हुए इस्लामी उम्मत के स्थान और दैवीय धर्म की विजय के वादे से संबंधित कुरआन की कुछ आयतों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुरआन का संदेश किसी एक समाज या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इस्लामी संदेश की प्रकृति वैश्विक है।

उन्होंने कहा कि जब यही संदेश दुनिया के किसी क्षेत्र में प्रकट होकर शक्ति प्राप्त करता है तो उसके प्रभाव दूसरे राष्ट्रों और समाजों तक भी पहुंच सकते हैं।

हिज़्बुल्लाह लेबनान की केंद्रीय परिषद के सदस्य ने 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्रांति का प्रभाव केवल ईरान की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। उनके अनुसार, इसके प्रभाव क्षेत्र के विभिन्न देशों और यहां तक कि पश्चिमी देशों में रहने वाले मुसलमानों के बीच भी दिखाई दिए और मुस्लिम समाज के एक वर्ग का ध्यान दोबारा धर्म, इस्लामी पहचान और इस्लामी मूल्यों की ओर आकर्षित हुआ।

उन्होंने पिछले वर्षों के दौरान क्षेत्र में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिरोध आंदोलनों के केंद्रों और नेताओं को निशाना बनाने की कोशिशें इस्लामी आंदोलनों को कमजोर करने का कारण नहीं बनतीं, बल्कि कई अवसरों पर इन आंदोलनों के समर्थकों में जागरूकता, सामाजिक भागीदारी और आपसी एकता बढ़ाने का कारण बन सकती हैं।

शेख हसन बगदादी ने कहा कि उम्मत की जागृति और जागरूक कौमों का लक्ष्य नेताओं की शहादत के साथ समाप्त नहीं होता। बल्कि कई अवसरों पर शहीदों का खून कौमों की जागरूकता और आगे संघर्ष के लिए प्रेरणा बन सकता है।

हिज़्बुल्लाह लेबनान की केंद्रीय परिषद के सदस्य ने ईरान, लेबनान, यमन, इराक और फिलिस्तीन में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए इन घटनाक्रमों को कौमों में बढ़ती जागरूकता और सामूहिक भागीदारी का संकेत बताया। उन्होंने कहा कि दबाव के सामने कौमों का प्रतिरोध और दृढ़ता क्षेत्र की परिस्थितियों और मौजूदा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

ग़ज़ा में जारी युद्ध और मानवीय संकट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर विनाश, मानवीय क्षति और भारी दबाव के बावजूद फिलिस्तीन का मुद्दा अब भी जीवित है और फिलिस्तीनी प्रतिरोध आज भी क्षेत्र में हो रहे बदलावों में एक प्रभावशाली तत्व के रूप में मौजूद है।

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