हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, बहाई धर्म ने शुरुआत से ही स्वयं को इस्लाम और शिया धर्म से जुड़ा हुआ बताया और इमाम महदी (अ) के बारे में कुछ दावों के साथ सामने आया। लेकिन आगे चलकर यह आंदोलन जिस दिशा में बढ़ा, उसे समझने से शिया धर्म और बहाई धर्म के बीच मतभेदों से जुड़े कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं।
प्रस्तुत लेख में शिया धर्म और बहाई धर्म के बीच मतभेदों के कारणों पर संक्षिप्त चर्चा की गई है।
मतभेद का मूल प्रश्न: बहाई धर्म की शुरुआत कैसे हुई?
बहाई धर्म का विरोध क्यों किया जाता है, यह समझने के लिए इसके शुरुआती इतिहास पर ध्यान देना आवश्यक है। इस्लाम और शिया धर्म दूसरे धर्मों के साथ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद, मान्यताओं में अंतर और किसी धर्म की बुनियादी शिक्षाओं को चुनौती देने के बीच अंतर करते हैं।
ईसाई, यहूदी या ज़रतुश्ती धर्म का अनुयायी पैग़म्बर-ए-इस्लाम (स) को स्वीकार न करे या क़ुरआन को ईश्वरीय ग्रंथ न माने, तो यह मान्यताओं का अंतर है। लेकिन इस लेख के अनुसार, बहाई धर्म का मामला इससे अलग है, क्योंकि इसकी शुरुआत इस्लामी वातावरण के भीतर और शिया धर्म की अवधारणाओं तथा धार्मिक पदों के संदर्भ में हुई थी।
इसकी शुरुआत इमाम महदी (अ) से संबंध होने के दावे के साथ हुई। अली मुहम्मद शीराज़ी ने पहले स्वयं को ‘बाब’ कहा। इसका अर्थ यह था कि उन्होंने इमाम महदी (अ) तक पहुंचने का मार्ग और उनके साथ संपर्क का माध्यम होने का दावा किया। यह दावा ऐसे समय में किया गया, जब वे स्वयं को मुसलमान और शिया बताते थे तथा इमाम महदी (अ) से अपने संबंध को भी इसी धार्मिक संदर्भ में प्रस्तुत करते थे।
हालांकि, उनका दावा यहीं तक सीमित नहीं रहा। पहले उन्होंने कहा कि वे ‘बाब’ हैं और इमाम महदी (अ) से संपर्क का माध्यम हैं। इसके बाद उन्होंने स्वयं को इमाम महदी (अ) घोषित किया और फिर पैग़म्बर होने का दावा किया।
इस घटनाक्रम का महत्व दावों में आए क्रमिक बदलाव में है। इस आंदोलन की शुरुआत इमाम महदी (अ) से संपर्क का माध्यम होने के दावे से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह दावा विस्तृत होता गया। पहले ‘बाब’ और माध्यम होने की बात सामने आई, फिर महदवियत का दावा किया गया और उसके बाद पैग़म्बरी का दावा सामने आया। इस प्रकार, इमाम महदी (अ) से संबंध होने के दावे से शुरू हुआ सिलसिला अंततः पैग़म्बरी के दावे तक पहुंचा।
यही घटनाक्रम दर्शाता है कि मामला केवल सामान्य वैचारिक मतभेद का नहीं है, बल्कि ऐसे दावों का है जो शिया धर्म की बुनियादी मान्यताओं में से एक को सीधे चुनौती देते हैं।
इस आंदोलन के बाद के घटनाक्रम और उसके विभिन्न संपर्कों को समझना भी महत्वपूर्ण है। विदेशी शक्तियों, विशेष रूप से ब्रिटेन, की भूमिका और यहूदी समुदायों के कुछ संगठनों के साथ इसके संबंधों को लेकर विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में दावे और दस्तावेज़ प्रस्तुत किए गए हैं।
इस विषय पर बिना पूर्वाग्रह के विचार करने के लिए ऐतिहासिक स्रोतों और पश्चिमी शोधों का भी अध्ययन किया जा सकता है। इसके अंतर्गत बहाई धर्म के विस्तार, उसके नेताओं के विदेशी शक्तियों के साथ संबंधों, इस धर्म के मुख्यालय के फ़िलिस्तीन के क्षेत्र में स्थापित होने और विश्व बहाई केंद्र के हाइफ़ा में स्थित होने के कारणों की जांच की जा सकती है। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में बीसवीं सदी की शुरुआत से मध्य पूर्व में बहाई नेताओं और ब्रिटिश नेटवर्क के बीच संपर्कों का भी उल्लेख किया गया है। ब्रिटेन की फ़िलिस्तीन में मौजूदगी के दौरान इन संपर्कों का महत्व बढ़ने की बात भी कही गई है।
इसलिए, बहस का विषय दूसरे लोगों की मान्यताओं का सम्मान करना या न करना नहीं है। प्रत्येक धार्मिक समुदाय अपनी बुनियादी मान्यताओं की रक्षा करता है और यह स्वीकार नहीं करता कि कोई व्यक्ति उसी धर्म के नाम का उपयोग करके उसके पैग़म्बर, इमाम या बुनियादी धार्मिक सिद्धांतों की स्थिति को अपनी इच्छानुसार बदल दे और लोगों को अपने पीछे चलने के लिए प्रेरित करे। शिया धर्म के लिए बहाई धर्म का प्रश्न इसी बिंदु से शुरू होता है। इस आंदोलन ने इमाम महदी (अ) से संबंध होने के दावे के साथ शुरुआत की, बाद में महदवियत और फिर पैग़म्बरी का दावा किया तथा आगे चलकर विदेशी शक्तियों के कुछ नेटवर्कों के साथ भी इसके संबंध बताए गए। इन संबंधों का ऐतिहासिक अध्ययन इस आंदोलन को समझने के लिए आवश्यक बताया गया है।
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