हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इमारत-ए-शरिया के बैठक कक्ष में आयोजित इस बैठक को संबोधित करते हुए इमारत-ए-शरिया के कार्यवाहक नाज़िम मुफ्ती मुहम्मद सोहराब नदवी ने कहा कि धार्मिक मदरसों ने भारत के निर्माण और विकास के साथ-साथ ब्रिटिश शासन से देश की आजादी के संघर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मदरसों से जुड़े विद्वानों और धर्मगुरुओं के बलिदान देश के इतिहास का अहम हिस्सा हैं। हालांकि, उनके अनुसार, वर्तमान समय में कुछ फासीवादी तत्वों द्वारा मदरसों के खिलाफ निराधार प्रचार किया जा रहा है। इसका मुकाबला करने के लिए सामूहिक जागरूकता, एकता और संगठित प्रयासों की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि मदरसों के भविष्य, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और धार्मिक संस्थानों के खिलाफ गतिविधियों को लेकर बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर लोगों को इन संस्थानों की ऐतिहासिक, शैक्षिक और सामाजिक सेवाओं से अवगत कराना आवश्यक है। इस संबंध में मस्जिदों के इमामों और उलेमा की विशेष जिम्मेदारी है कि वे समाज में जागरूकता पैदा करें और धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा के लिए साझा कार्ययोजना अपनाएं।
मुफ्ती मुहम्मद सोहराब नदवी ने बताया कि इमारत-ए-शरिया के अमीर-ए-शरीयत मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी के नेतृत्व में 11 नवंबर 2026 को पटना में गांधी मैदान के निकट स्थित बापू सभागार ऑडिटोरियम में मदरसों का सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इसमें बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मदरसों के जिम्मेदार प्रतिनिधि, उलेमा, बुद्धिजीवी और शिक्षा विशेषज्ञ भाग लेंगे।
उन्होंने मस्जिदों के इमामों से अपील की कि वे अपने जुमे के खुतबों तथा मिंबर और मेहराब के माध्यम से लोगों को धार्मिक मदरसों और इस्लामी शिक्षण संस्थानों के महत्व से अवगत कराएं। साथ ही, इन संस्थानों के खिलाफ होने वाली गतिविधियों के प्रति जागरूकता पैदा करें तथा मदरसों, मकतबों, मस्जिदों और खानकाहों की रक्षा के लिए दुआ के साथ व्यावहारिक प्रयास भी जारी रखें।

धार्मिक संस्थानों की सुरक्षा और मुस्लिम समुदाय की एकता
इमारत-ए-शरिया के दारुल कज़ा के प्रमुख मुफ्ती मुहम्मद अनज़ार आलम कासमी ने मदरसों और मस्जिदों को इस्लामी पहचान का प्रतीक बताते हुए कहा कि इनकी रक्षा करना पूरे मुस्लिम समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर दिया कि धार्मिक संस्थानों के सामने आने वाली समस्याओं का मुकाबला आपसी एकता, सामूहिक संघर्ष और जिम्मेदाराना रवैये के साथ किया जाना चाहिए।
इमारत-ए-शरिया के उप-नाज़िम मुफ्ती सना-उल-हुदा कासमी ने सरकारी परिपत्रों और नोटिसों की विषयवस्तु पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन कदमों का प्रभाव केवल मदरसों तक सीमित न रहकर मस्जिदों के मिंबर और मेहराब तक पहुंचने की आशंका है। उन्होंने मस्जिदों के इमामों से अपील की कि वे आपसी सहयोग के माध्यम से 11 नवंबर को होने वाले सम्मेलन को सफल बनाने में अपनी भूमिका निभाएं।
मुफ्ती एहतिकामुल हक कासमी ने मदरसों के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में धार्मिक शिक्षण संस्थानों के सामने मौजूद चुनौतियों से अवगत रहना और उनके समाधान के लिए गंभीर प्रयास करना जरूरी है। वहीं, उप-काज़ी-ए-शरीयत मुफ्ती वसी अहमद कासमी ने भी मदरसों और मस्जिदों की रक्षा को मुस्लिम समुदाय का धार्मिक कर्तव्य बताते हुए सम्मेलन की सफलता पर जोर दिया।

सहायक नाज़िम रिजवान अहमद नदवी ने मस्जिदों के इमामों की धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए कहा कि मुस्लिम समाज में इमामों की केंद्रीय भूमिका होती है। इसलिए उन्हें लोगों में जागरूकता पैदा करने और सम्मेलन को सफल बनाने के लिए भरपूर प्रयास करना चाहिए।
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