हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, शहीद उस्ताद आयतुल्लाह मुर्तज़ा मुताहरी ने अपनी एक पुस्तक और तकरीर में ‘हज़रत फातिमा ज़हरा (स) के ख़ुत्बे से मिलने वाले शैक्षणिक और व्यावहारिक सबक’ पर प्रकाश डाला है। उनके विचार इस प्रकार हैं:
हज़रत फातिमा ज़हरा (स) का स्वर्गवास बहुत कम उम्र में हो गया था। उस दौर में उनके विरोधी भी बहुत अधिक थे, जिसके कारण उनकी शिक्षाओं और रचनाओं का बहुत कम हिस्सा हम तक पहुंच सका। हालांकि, सौभाग्य से उनका लगभग एक घंटे का एक विस्तृत ख़ुत्बा आज भी सुरक्षित है, जिसे उन्होंने लगभग 18 वर्ष की आयु में दिया था। कुछ के अनुसार, उस समय उनकी उम्र अधिकतम 27 वर्ष थी। इस ख़ुत्बे को केवल शिया विद्वानों ने ही नहीं, बल्कि तीसरी हिजरी शताब्दी में बगदादी ने भी अपनी रिवायत में उल्लेख किया है।
केवल यह एक ख़ुत्बा ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि एक मुस्लिम महिला पुरुषों के साथ अपनी मर्यादा और पर्दे का ध्यान रखते हुए भी कितना व्यापक ज्ञान रख सकती है और सामाजिक मामलों में कितनी प्रभावी भूमिका निभा सकती है।
हज़रत फातिमा ज़हरा (स) के ख़ुत्बे में तौहीद का बयान है, वह भी उसी उच्च स्तर पर जिस स्तर पर नहजुल बलाग़ा में तौहीद की चर्चा मिलती है। यह ऐसा गहन विषय है, जिसकी गहराई तक बड़े-बड़े दार्शनिकों की पहुंच भी आसान नहीं है। जब वे अल्लाह की ज़ात और उसकी विशेषताओं के बारे में बात करती हैं, तो ऐसा लगता है मानो दुनिया के महानतम दार्शनिकों के स्तर पर विचार प्रस्तुत कर रही हों। यहां तक कि इब्ने सीना जैसे महान दार्शनिक के लिए भी इस स्तर का ख़ुत्बा देना आसान नहीं होता।
इसके बाद वे अचानक इस्लामी अहकाम का फलसफ़ा और उनके पीछे छिपे उद्देश्यों की व्याख्या करने लगती हैं। वे बताती हैं कि अल्लाह ने नमाज़ क्यों वाजिब की, रोज़ा किस उद्देश्य से फ़र्ज़ किया, हज क्यों वाजिब किया, अम्र बिल मारूफ़ और नह्य अनिल मुनकर का दायित्व क्यों सौंपा तथा ज़कात क्यों अनिवार्य की।
इसके बाद वे इस्लाम से पहले के अरब समाज की स्थिति और इस्लाम के आगमन से उसमें आए व्यापक परिवर्तन का विश्लेषण करती हैं। वे अरबों को उनके अतीत की याद दिलाते हुए बताती हैं कि इस्लाम से पहले उनका सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन कैसा था। साथ ही, यह भी स्पष्ट करती हैं कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) के माध्यम से उन्हें भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में कौन-कौन सी नेमतें और सुधार प्राप्त हुए। इसके बाद वे अपने तर्कों और दलीलों के माध्यम से अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
यह ख़ुत्बा मदीना की मस्जिद में हज़ारों लोगों की उपस्थिति में दिया गया था। इसके बावजूद हज़रत फातिमा ज़हरा (स) पुरुषों के सामने मिम्बर पर नहीं गईं कि कहीं इसे दिखावे का माध्यम न समझ लिया जाए। पैग़म्बर (स) के समय की परंपरा के अनुसार, महिलाएं और पुरुष अलग-अलग बैठते थे तथा उनके बीच एक ऊंचा पर्दा लगाया जाता था। हज़रत फातिमा ज़हरा (स) ने इसी पर्दे के पीछे से अपना पूरा ख़ुत्बा दिया और सभा में मौजूद महिलाओं और पुरुषों को गहराई तक प्रभावित कर दिया।
यही वह आदर्श है जिसका उल्लेख किया गया है। हज़रत फातिमा ज़हरा (स) में व्यक्तित्व भी था और हया भी, पवित्रता भी थी और मर्यादा भी। वे कभी स्वयं को पुरुषों की अनुचित निगाहों के सामने प्रस्तुत नहीं करती थीं, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं था कि वे ज्ञान और समझ से वंचित थीं या उन्हें सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी नहीं थी।
स्रोत: पुस्तक ‘हेमासे-ए-हुसैनी’, भाग 1, पेज 381।
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