हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हज़रत शाह मीराँ, हुज़ूरे परनूर सैयद हुसैन असग़र उर्फ हज़रत मीराँ सैयद हुसैन खंगसवार मशहदी रहमतुल्लाह अलैह, भारतीय उपमहाद्वीप की उन महान और चमकती हुई शख्सियतों में शुमार होते हैं जिन्होंने ज्ञान, आध्यात्मिकता, साहस, त्याग और शहादत के जरिए इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी।
आपका जन्म एक ऐसे ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण घराने में हुआ जो गुणों और उत्कृष्टता का चित्र था। आपकी वालिदा बीबी हाजरा रहमहल्लाह एक सुयोग्य और धार्मिक परिवार से ताल्लुक रखती थीं, जबकि आपके वालिद हज़रत सैयद इब्राहिम मुहद्दिस रहमतुल्लाह अलैह एक महान विद्वान, परहेज़गार और मशहूर मुहद्दिस थे, जिन्हें रिवायत और दिरायत (समझ) के ज्ञान पर पूरी पकड़ थी।
जब बीबी हाजरा की कामनाओं के बाग़ में यह रौशन फूल खिला तो मानो इतिहास के क्षितिज पर एक ऐसा चाँद उदय हुआ जिसकी रोशनी में कभी बुढ़ापे या मुरझाने का ख़याल नहीं किया जा सकता था। यही वजह है कि आपको हज़रत मीराँ सैयद हुसैन खंगसवार कहा गया, और आपकी वीरता और बहादुरी अपने दौर में अरब जगत तक मशहूर हुई।
उपाधियाँ और आध्यात्मिक महानता:
हज़रत शाह मीराँ रहमतुल्लाह अलैह की उपाधियाँ उनके रूहानी मक़ाम और महानता के आईनेदार हैं। ये उपाधियाँ विभिन्न बड़े विद्वानों की किताबों, ख़ास तौर पर 'शौकत-ए-खंगसवार', 'शुआ-ए-खंगसवार' और 'गुलदस्ता-ए-खंगसवार' में मौजूद हैं। इन उपाधियों में:
ज़ुब्दतुल आरिफ़ीन
क़ुद्वतुस्सालिकीन (साधकों का आदर्श),
बुरहानुल वासिलीन (ईश्वर तक पहुँचने वालों का प्रमाण),
ताजुल मुक़र्रबीन वल मुहक्किक़ीन
नूर-ए-इलाही
नबीरा-ए-हैदर-ए-कर्रार (हज़रत अली के वंशज),
रिश्क-ए-मसीहा (मसीहा पर भी इर्षा करने लायक),
ताजदार-ए-शुहदा-ए-हिंद हिंदुस्तान के शहीदों का ताजपोश),
शहीद-ए-आज़म दर हिंद हिंदुस्तान में महानतम शहीद)

ख़ास तौर पर ग़ौर करने लायक हैं।
ये उपाधियाँ महज़ भाषणबाज़ी वाले शब्द नहीं बल्कि आपकी व्यावहारिक ज़िंदगी, जिहादी भूमिका, रूहानी असर और कुर्बानियों का सार हैं। आपने भारतीय उपमहाद्वीप की धरती, ख़ास तौर पर राजस्थान के रेगिस्तानों में इमाम हुसैन की शहादत (अज़ा-ए-हुसैनी) के दीप जलाए और अपने आँसुओं से प्रेम की धरती को सींचा।
शहादत और शाश्वत संदेश:
हज़रत शाह मीराँ रहमतुल्लाह अलैह ने जवानी के बहार में, ठीक नमाज़ की हालत में, ईश्वर की राह में शहादत का प्याला पिया। आपकी शहादत महज़ एक व्यक्ति की कुर्बानी नहीं बल्कि एक दौर, एक संदेश और एक आंदोलन थी, जिसने हिंदुस्तान की धरती पर तौहीद, विलायत और अहले बैत की मज़लूमियत का चिराग़ जलाए रखा।
आज भी आपका पवित्र मज़ार लोगों की शरणस्थली है, जहाँ अनगिनत लोग रूहानी सुकून और शारीरिक शफ़ा पाते हैं और यह हक़ीक़त आपकी उपाधि 'रिश्क-ए-मसीहा' की रौशन दलील है।
आपकी शहादत की तारीख़ 18 रजबुल मुरज्जब है। इस दुख भरे मौक़े पर हम दुनिया के मुसलमानों को अपनी संवेदना पेश करते हैं और रब्बुल इज़्ज़त की दरगाह में दुआगो हैं कि हमें शहीदों की महानता को समझने, उनके रास्ते पर चलने और उनके संदेश को ज़िंदा रखने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन या रब्बल आलमीन
लेखक: मौलाना गुलज़ार जाफ़री, तारागढ़, अजमेर
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