रविवार 8 फ़रवरी 2026 - 07:06
अख़लाक़ न हों तो मुसलमान होने का दावा खोखला है : मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी

मुंबई के इस्लाम जिमख़ाना में जमाअत-ए-इस्लामी महाराष्ट्र और मजलिस-उल-उलेमा तहरीक-ए-इस्लामी महाराष्ट्र के संयुक्त तत्वावधान में “मौजूदा हालात में मिल्लत की मजबूती और तरक़्क़ी का कार्य-योजना” विषय पर एक महत्वपूर्ण विचार-विमर्श का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में धार्मिक, सामाजिक नेता, उलेमा और बुद्धिजीवियों ने मौजूदा परिस्थितियों में मुसलमानों की सामाजिक उन्नति, शिक्षा और आर्थिक मजबूती, नैतिक सुधार और व्यावहारिक कदम उठाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और निराशा छोड़कर संगठित संघर्ष अपनाने की अपील की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, देश के मौजूदा हालात में मुसलमानों के विकास के रास्ते तलाशने और उन्हें मायूसी से निकालकर अमल के रास्ते पर लाने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया।

अख़लाक़ न हों तो मुसलमान होने का दावा खोखला है : मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष इंजीनियर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में शहर के गणमान्य लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हुए। कई वक्ताओं ने कहा कि सिर्फ योजना बनाना ही नहीं, बल्कि उस पर सख़्ती से अमल करना भी ज़रूरी है। कार्यक्रम की शुरुआत में मौलवी इलियास ख़ान फलाही ने कहा कि अल्लाह तआला इस उम्मत को एक मज़बूत उम्मत के रूप में देखना चाहता है ताकि पूरी मानवता को उसका लाभ मिले। “ख़ैर-उम्मत” होने का मतलब है कि मुसलमान पूरी इंसानियत के लिए बेहतर बनें। हमारे पास एक संपूर्ण दीन (इस्लाम) है और नबी (स) का मदीनी मॉडल हमारे सामने है, जिसने मानवता की समस्याओं का समाधान पेश किया। आज के नफ़रत भरे माहौल में भी हमारा रवैया नकारात्मक नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमारा काम भलाई और सुधार है। नबी (स) ने नैतिक पतन के दौर में भी समाज को बदलकर दिखाया—ईमान, अल्लाह से गहरा रिश्ता और व्यापक योजना के साथ मैदान-ए-अमल में उतरकर।

इंजीनियर सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि आज हम बहुत कठिन दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि कौमें मुश्किल हालात में ही उभरती हैं। उन्होंने कहा कि जब किसी क़ौम का अस्तित्व खतरे में होता है, तभी वह नए रास्ते तलाशती है। इसलिए निराश होने की ज़रूरत नहीं। यह हालात अल्लाह की तरफ़ से उम्मत को जगाने का ज़रिया भी हो सकते हैं। उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि वे खुद को बचाने के साथ-साथ अपनी कमज़ोरियों को भी दूर करें, अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें और समस्याओं का रोना रोने के बजाय हल खोजें।

उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ आर्थिक तरक़्क़ी के लिए संगठित प्रयासों पर भी ज़ोर दिया और बताया कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद इस दिशा में काम कर रही है।

अख़लाक़ न हों तो मुसलमान होने का दावा खोखला है : मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी

इंक़िलाब मुंबई के संपादक शाहिद लतीफ़ ने मुसलमानों में फैली कुछ बुरी रस्मों पर बात की और उन्हें उनका असली उद्देश्य याद दिलाया। उन्होंने कहा कि हम अक्सर सिर्फ़ दुश्मनों को कोसते हैं, लेकिन जो व्यावहारिक क़दम उठाने चाहिए, वह नहीं उठाते।
तीन तलाक़ के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि हमारे पास खुद ठोस आंकड़े नहीं हैं, जिससे हम अदालत या आरोप लगाने वालों को सही स्थिति बता सकें। इसलिए इस दिशा में भी काम करने की ज़रूरत है।

शिया समुदाय की ओर से बोलते हुए वरिष्ठ आलिम मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी ने नैतिक गिरावट पर सख़्त चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सिर्फ उलेमा और इमामों की ही नहीं, बल्कि माता-पिता की भी ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों की सही परवरिश करें और इस पर नज़र रखें कि उनके बच्चे रात में कहां और क्या कर रहे हैं। उन्होंने साफ़ कहा: “अगर हमारे अंदर अख़लाक़ नहीं है, तो मुसलमान होने का दावा बेकार है।”

“अगर हमारे अंदर अख़लाक़ नहीं है, तो मुसलमान होने का दावा बेकार है।”

सामाजिक कार्यकर्ता सलीम अलवारे ने कहा कि ऐसे हालात पहले भी आ चुके हैं। उन्होंने अपने पिता का हवाला देते हुए बताया कि आज़ादी के बाद कई साल तक मुस्लिम इलाक़ों में लोग हमले के डर से रात-रात भर पहरा देते थे।

अख़लाक़ न हों तो मुसलमान होने का दावा खोखला है : मौलाना ज़हीर अब्बास रिज़वी

मौलवी महमूद दरियाबादी ने कहा कि हालात ज़रूर बिगड़े हैं, लेकिन समाधान यही है कि लोगों के दिमाग़ बदलने के लिए लगातार संवाद किया जाए और जहां भी मुसलमानों पर ज़ुल्म हो, वहां अदालत का सहारा लिया जाए—चाहे तुरंत फ़ायदा दिखे या नहीं।

कार्यक्रम में बोहरा समुदाय से शब्बीर भोपालवाला, मौलवी मंजर अहसन सलफ़ी समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी राय रखी। कार्यक्रम का संचालन मौलवी नसीर इस्लाही (नाज़िम-ए-आला, मजलिस-उल-उलेमा तहरीक-ए-इस्लामी महाराष्ट्र) ने किया।

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