हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी ने इस्लामाबाद की एक मस्जिद में नमाज़-ए-जुमआ के दौरान शिया नमाज़ियों पर हुए आतंकवादी हमले की शदीद मज़म्मत करते हुए शोहदा के दर्जात की बुलंदी और ज़ख़्मियों की जल्द सेहतयाबी के लिए दुआ की।
उन्होंने कहा कि ऐसी आतंकवादी कार्रवाइयों के ज़रिए साम्राज्यवादी और इज़राईली ताक़तें मुख़्तलिफ़ मुल्कों और क़ौमों पर अपनी बालादस्ती क़ायम करना चाहती हैं। उनके मुताबिक़, इन हमलों का मक़सद इस्लाम की साख़्त को नुक़सान पहुँचाना और ख़ासतौर पर शिया मुसलमानों को निशाना बनाना है।
मौलाना ज़ैदी ने इस अम्र पर गहरे अफ़सोस का इज़हार किया कि इतने वाज़ेह ज़ुल्म के बावजूद कुछ उलेमा और मुफ़्तियों की ख़ामोशी बेहद तशवीशनाक है। उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद में नमाज़-ए-जुमआ के दौरान हुए ख़ुदकुश हमले पर हिन्द व पाक के मज़हबी हल्क़ों की ख़ामोशी, क़ातिल और आतंकवादी अनासिर के हौसले बुलंद करने के बराबर है।
उनका कहना था कि जब मिम्बर व मेहराब हक़गोई के बजाय मस्लहत का शिकार हो जाएँ, तो बातिल ताक़तों को ग़लबा हासिल करने का मौक़ा मिल जाता है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आतंकवादी ताक़तें अपने नापाक मक़ासिद में कभी कामयाब नहीं हो सकतीं, क्योंकि उम्मत-ए-मुस्लिमा में मज़ाहमत का जज़्बा मौजूद है और दीन की क़ियादत व अवाम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने की सलाहियत रखती हैं।
आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए तजावीज़ पेश करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ़ ताक़त के इस्तेमाल से मसअला हल नहीं होगा, बल्कि तकफ़ीरी नज़रियात का इल्मी रद्द, बैनुल-मुस्लिमीन इत्तेहाद का फ़रोग़, मआशी ख़ुदमुख़्तारी और दुश्मन-शिनासी बसीरत पैदा करना बेहद ज़रूरी है। साथ ही उन्होंने शिद्दत-पसंद अनासिर के ख़िलाफ़ मोअस्सिर क़ानूनी कार्रवाई पर भी ज़ोर दिया।
आख़िर में मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी ने कहा कि नाहक़ बहाया गया ख़ून कभी ज़ाया नहीं जाता, और जो उलेमा, दानिश्वर या मज़हबी ज़िम्मेदारान मज़लूमों की हिमायत में आवाज़ बुलंद नहीं करते, तारीख़ उन्हें ज़ालिमों के मददगार के तौर पर याद रखेगी। उनके मुताबिक़, हक़ीक़ी सरबुलंदी अल्लाह की बंदगी और बेख़ौफ़ होकर हक़ पर क़ायम रहने में है।
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