हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , नजफ़ अशरफ़ में वाक़े हरम इमाम अली में इस नुमाइश का एहतिमाम किया गया। हरम मुबारक की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक, इस नुमाइश में मुसव्वरी, मुआसिर व क्लासिकी ख़ाके, डिजिटल आर्ट और नायाब ख़त्ती नुस्ख़ों समेत मुख़्तलिफ़ फ़नपारे पेश किए गए।
इस नुमाइश का बुनियादी मक़सद मुख़्तलिफ़ ज़बानों और तहज़ीबों के दरमियान वहदत-ए-कलिमा को उजागर करना और इमाम मेंहदी (अज) के ज़ुहूर के इंतज़ार के तसव्वुर पर आलमी सतह पर हम-आहंगी को फ़रोग़ देना है।
मरकज़ मुतालिआत तख़स्सुसी इमाम हसन (अ) के मुदीर सैयद काज़िम अल-ख़ुरासान ने इस नुमाइश को एक ऐसा वहदत-आफ़रीन पैग़ाम क़रार दिया जो सरहदों से मावरा है। उनके बक़ौल, इंतज़ार-ए-फ़रज को एक मुश्तरका मआनवी और इंसानी क़दर के तौर पर पेश किया गया है, जो मुख़्तलिफ़ क़ौमों और मुआशरों के दरमियान फ़िक्री क़ुर्बत का सबब बन सकता है।
आसार-ए-क़दीमा व सक़ाफ़ती विरसा यूनिट के सरबराह डॉक्टर अब्दुलहादी अल-इबराहीमी ने तहज़ीबों के माबैन मुकालमे को मज़बूत बनाने में फ़न के किरदार पर ज़ोर देते हुए कहा कि दीन, फ़नकारों को गहरे और बामानी मज़ामीन की तरफ़ रहनुमाई फ़राहम करता है। उन्होंने इस तक़रीब को इस्लामी फ़न का एक आलमी तआरुफ़ क़रार दिया, जो बैनुल-अक़वामी रवाबित और सक़ाफ़ती तबादले को वुसअत देता है।
बुनियाद-ए-फ़न व मीडिया “क़ाफ़” के सरबराह ने अपने इंटरव्यू में कहा कि मुख़्तलिफ़ देश और मज़ाहिब से तअल्लुक़ रखने वाले शरीक फ़नकार दरअस्ल अपने-अपने मुल्कों के सक़ाफ़ती सफ़ीर के तौर पर शरीक हुए। चीन और ब्राज़ील समेत कई देश के फ़नकार पहली मर्तबा इराक़ और नजफ़ अशरफ़ आए, जिससे इस नुमाइश के आलमी दायरा-ए-असर और बैनुल-अक़वामी रवाबित की वुसअत का अंदाज़ा होता है।
यह बैनुल-अक़वामी सक़ाफ़ती प्रोग्राम न सिर्फ़ फ़ुनून-ए-लतीफ़ा का मज़हर है, बल्कि इंतज़ार-ए-इमाम मेंहदी (अज) के आलमी और इंसानी पैग़ाम को उजागर करने की एक मोअस्सिर कोशिश भी क़रार दिया जा रहा है।
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