गुरुवार 26 मार्च 2026 - 16:54
युद्ध की स्थिति में तौहीदी बच्चों की परवरिश के छह रणनीतिक सिद्धांत

इस्लामी सभ्यता और पश्चिम के बीच टकराव में, किशोरों की परवरिश सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। जहाँ आधुनिक परामर्श भौतिकवादी दृष्टिकोण के साथ बच्चों को जिहाद, शहादत और रचनात्मक कठिनाइयों जैसे उच्च मूल्यों से अलग-थलग करने की कोशिश करते हैं

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी: इस्लामी सभ्यता और पश्चिम के बीच टकराव में, किशोरों की परवरिश सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। जहाँ आधुनिक परामर्श भौतिकवादी दृष्टिकोण के साथ बच्चों को जिहाद, शहादत और रचनात्मक कठिनाइयों जैसे उच्च मूल्यों से अलग-थलग करने की कोशिश करते हैं, वहीं वही पर आधारित तर्क 'तौहीदी फितरत' और 'आशूराई प्रतिमानों' के आधार पर ऐसे किशोर का निर्माण करता है जो समय के उथल-पुथल में अल्लाह पर भरोसा करने का मज़बूत आधार रखता है।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन अब्बासी वल्दी ने अपने एक भाषण में युद्ध की स्थितियों में माता-पिता के कर्तव्यों के विषय पर चर्चा की है। उनके भाषण के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

पहला सिद्धांत: दृष्टिकोण 

  • बच्चे बड़े होते हैं ।
  • बच्चों में फितरत होती है।
  • युद्ध, परवरिश के लिए 'शॉर्टकट' का काम करता है।

दूसरा सिद्धांत: कौशल 

  • बच्चे सुनना पसंद करते हैं:
    • अल्लाह की सिफ़तो का वर्णन करें।
    • अहलेबैत (अ) के बारे में बताएं।
    • क़यामत का वर्णन करें।
    • अल्लाह की सुन्नतों के बारे में बताएं।
    • दुश्मन की क्रूरता के बारे में बताएं।
    • शहीदों के बारे में बताएं।

1. बच्चे की आत्मा को छोटा न समझना और फितरत की प्रधानता:
हमें अपने बच्चों को अपने मन में छोटा नहीं रखना चाहिए और न ही उन्हें उनकी उच्च और स्वाभाविक यात्रा से वंचित करना चाहिए। मूल बात यह है कि बच्चे बड़े होते हैं; उनमें तौहीदी और वलायती (नैतिक नेतृत्व से जुड़ी) फितरत होती है। जब हम उन्हें अत्यधिक छोटा मान लेते हैं, तो वास्तव में हम उनके प्राकृतिक और आध्यात्मिक विकास में बाधक बनते हैं। यह समझना ज़रूरी है कि असली परवरिश मैदान में होती है, न कि सिर्फ क्लासरूम में या सैद्धांतिक उपदेशों से।

2. उद्देश्यपूर्ण कठिनाइयाँ और युद्ध 'परवरिश का शॉर्टकट' है:
युद्ध और कठिनाइयाँ सामान्यतः परवरिश के प्रमुख कारक हैं। जो माता-पिता अपने बच्चे को कोई भी कठिनाई नहीं झेलने देते, वे वास्तव में उसकी परवरिश में बाधा डालते हैं। जैसे शारीरिक विकास में अगर माँ हमेशा बच्चे का हाथ थामे रखे ताकि वह गिरे नहीं, तो उसकी बाँहें और घुटने मज़बूत नहीं होंगे, वैसे ही आध्यात्मिक मामलों में भी है।

कठिनाइयाँ इंसान को बड़ा बनाती हैं। युद्ध एक 'शॉर्टकट' है जो कभी-कभी बड़े होने का कई वर्षों का रास्ता कुछ ही दिनों में तय करा देता है। युद्ध का वातावरण इंसान के अस्तित्व के गहरे गुणों को सबसे तेज़ गति से उभारता है और सहानुभूति, दुश्मन-पहचान, भरोसा और दुनिया से मोह-भंग जैसे गुणों को एक ही दिन में किशोर के भीतर जड़ कर देता है।

3. पश्चिमी सभ्यता के मुक़ाबले 'मज़बूत बच्चे' (बच्चे-ए-मुक़ाविमत) की परवरिश की आवश्यकता:
भले ही हम कठोर युद्ध की स्थिति में न हों, फिर भी हमें 'मज़बूत बच्चा' तैयार करने की ज़रूरत है। पश्चिमी सभ्यता और वैश्विक अहंकार से हमारा टकराव कभी खत्म नहीं होता; यह केवल रूप बदल लेता है (जैसे नरम युद्ध)।

हमारे बच्चों को हमेशा अपनी जोशीली भावना बनाए रखनी चाहिए और दुश्मन का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इन अवधारणाओं को युद्ध के समय तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे परवरिश की प्रक्रिया में एक 'स्थायी आहार' के रूप में शामिल किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी उथल-पुथल के लिए प्रतिरोधी बन सके।

4. बच्चों में खुदा शनासी को लेकर पश्चिमी मनोविज्ञान की बुनियादों की समीक्षा:
बच्चे धार्मिक विषयों को सुनना पसंद करते हैं और उन्हें इसकी ज़रूरत होती है। अगर कोई बच्चा शुरू में धार्मिक विषयों को सुनने से हिचकता है, तो निराश नहीं होना चाहिए। जैसे शारीरिक पोषण में अगर बच्चा कुछ नहीं खाता, तो हम तरीका बदलकर फिर से उसकी ज़रूरत पूरी करने की कोशिश करते हैं, वैसे ही परवरिश में भी आकर्षक लहजे में बात करनी चाहिए।

हमें बच्चों के लिए अल्लाह की महानता, शक्ति, ज्ञान और बुद्धि का वर्णन करना चाहिए। उन लोगों की बात नहीं माननी चाहिए जो कहते हैं कि 'बच्चे अल्लाह को नहीं समझते'। पश्चिमी विकास मनोवैज्ञानिक ईसाई धर्मशास्त्र और अपने समझे गए ईश्वर के आधार पर नुस्खा देता है, न कि उस ईश्वर के आधार पर जिसका परिचय अमीरुल मोमिनीन (अ), इमाम सज्जाद (अ) और कुरआन ने दिया है। 

5. 'अनदेखी' के नुस्खों की समीक्षा और दिल को अल्लाह से जोड़ने की आवश्यकता:
यह बहुत अजीब और दुखद है कि कुछ सलाहकार इस सवाल पर कि 'हम बच्चों को शांत कैसे करें?', केवल यह नुस्खा देते हैं कि 'उन्हें माहौल से दूर करो' और 'व्यस्त रखो'। वे एक शब्द भी क्यों नहीं कहते कि बच्चों के दिलों को अल्लाह से जोड़ो?

क्या 6-7 साल का बच्चा दरूद भेजकर और अल्लाह से बात करके शांत नहीं हो सकता? तुम किस अल्लाह पर विश्वास रखते हो कि सोचते हो बच्चा उससे अपरिचित है? हमें बच्चों के दिमाग को भौतिकवादी (माद्दी) नहीं बनने देना चाहिए। साथ ही, अहलेबैत (अ) के सांसारिक और आध्यात्मिक पहलुओं का वर्णन करने से नहीं चूकना चाहिए; ये हमारे आदर्श और सुकून देने वाली शख्सियतें हैं। बच्चों से क़यामत, जन्नत और अनंतता के बारे में बात करें और उनके सवालों से घबराएँ नहीं।

6. आशूरा के आदर्शों की प्रधानता: अब्दुल्लाह बिन हसन (अ) से कासिम बिन हसन (अ) तक:
हम उस मसलक में हैं जहाँ 11 वर्षीय अब्दुल्लाह बिन हसन (अ) ने अपनी चाची का हाथ छोड़ दिया ताकि अपने चाचा (इमाम हुसैन अ) को दुश्मन की तलवार से बचा सकें। हमारे पास 13 वर्षीय कासिम बिन हसन (अ) जैसा आदर्श है, जो अल्लाह के मार्ग में मृत्यु को 'शहद से भी मीठा' मानते थे। हमारे पवित्र रक्षा (इरान-इराक युद्ध) को इन्हीं आदर्शों ने संचालित किया था। जो छात्र मोर्चे पर जाने के लिए नामांकन कराते थे, उनका तर्क कासिम बिन हसन (अ) हुआ करता था।

जो लोग आज कहते हैं कि बच्चे के लिए शोक सभा (रौज़ा) न पढ़ें या उसे किंडरगार्टन भेज दें ताकि शोक की आवाज़ न सुन सके, वे किस नियम के आधार पर बात कर रहे हैं? बच्चों से अल्लाह की सुन्नतों और दुनिया के आध्यात्मिक पक्ष के बारे में बात करें।

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