हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,यह सिर्फ कर्ज का संकट नहीं है, बल्कि एक वैचारिक दिवालियापन की कहानी है। यह वह दास्तान है जहां एक तरफ ईमान के दावे हैं और दूसरी तरफ सूदी समझौतों पर दस्तखत हो रहे हैं। ज़बान पर दीन, मगर निज़ाम में सूद यही असल मुश्किल है।
ज़रा गौर कीजिए कि जिस किताब-ए-हिदायत क़ुरआन में सूद को अल्लाह और उसके रसूल (स०अ०) के खिलाफ जंग क़रार दिया गया, उसी को मानने वाले अपनी अर्थव्यवस्था की बुनियाद उसी सूद पर रख चुके हैं। मानो खुदा से जंग का ऐलान भी मंज़ूर है, मगर निज़ाम की तब्दीली मंज़ूर नहीं! यह कैसा ईमान है जो इबादतों में तो नज़र आता है, मगर मुआमलात में गायब हो जाता है?
पाकिस्तान की मौजूदा हालत इसी सूदी निज़ाम का तार्किक अंजाम है। एक कर्ज लिया जाता है, उसे चुकाने के लिए दूसरा, फिर तीसरे की ज़रूरत यह एक ऐसा चक्र है जो ऊपर से सहारा देता है, मगर अंदर ही अंदर पूरी अर्थव्यवस्था की सांसें घोंट देता है। और जब क़र्ज़ देने वाला अपनी रक़म वापस मांगता है, तो लेने वाला हैरान होता है, शिकायत करता है और कभी-कभी उसे “सख्त रवैया” कहता है।
मगर सवाल यह है कि क्या सूदी समझौता करते वक्त इस “सख्ती” का अंदाज़ा नहीं होता?
क्या यह मालूम नहीं कि सूदी निज़ाम में हमदर्दी नहीं, सिर्फ हिसाब होता है?
क्या यह ख़बर नहीं कि इस रास्ते का अंजाम हमेशा दबाव, गु़लामी और बेबसी होता है?
यह तथाकथित मुसलमान! कहने को तो सूद को हराम मानते हैं, मगर रास्ता वही अपनाते हैं; खुदमुख्तारी का दावा भी करते हैं और कर्ज के आगे झुकते भी हैं; उम्मत की बात भी करते हैं और सूदी निज़ाम के सबसे बड़े क़ैदी भी बने रहते हैं।
यह दोहरा मापदंड सिर्फ नीतियों का मसला नहीं, बल्कि सोच का संकट है।
हकीकत यह है कि सूद सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक नैतिक और रूहानी ज़हर है। यह दौलत को कुछ हाथों में समेट देता है, कमज़ोर को और कमज़ोर और ताक़तवर को और ताक़तवर बना देता है। इसी लिए क़ुरआन ने इसे मिटाने और सदक़ात को बढ़ाने की बात कही मगर हमने इसके उलट रास्ता चुना।
और जब कोई क़ौम अल्लाह के साफ़ अहकाम को नजरअंदाज करती है, तो उसके नतीजे भी साफ़ होते हैं आर्थिक बेचैनी, सियासी दबाव और वैश्विक स्तर पर कमज़ोरी।
आज अगर यूएई कर्ज वापस मांगता है, तो कल कोई और मांगेगा।आज अगर आईएमएफ शर्तें सख्त करता है, तो कल और सख्त होंगी।
यह सब उसी सूदी निज़ाम का सिलसिला है जिसे हमने अपनी अर्थव्यवस्था का सहारा बना लिया है।
हैरानी की बात है कि यू ए ई और पाकिस्तान दोनों खुद को इस्लामी देश कहते हैं, मगर अमल में सूद जैसे खुले हराम में बराबर के शरीक हैं। ज़बान पर क़ुरआन और हदीस, और मामेलात में सूद! यह कैसा ईमान और कैसा निज़ाम?
सूदी माल से पेट भरने का नतीजा भी अजीब है: इस्लाम व इंसानियत दुश्मन की फ़ौज और कंपनियों की मौजूदगी तो बर्दाश्त है, मगर मज़लूमों की आवाज़ नागवार! इंसाफ़ का मापदंड भी अब मुफ़ाद के साथ बदल जाता है।
और इंतेहा यह कि जब ईरान अपने खिलाफ मौजूद अड्डों को निशाना बनाता है तो फ़ौरन “इस्लाम की दुहाई” का नारा बुलंद हो जाता है, लेकिन खुद ग़ैर-इस्लामी मआशी निज़ाम अपनाने में कोई झिझक नहीं।
जैसे मसअला उसूलों का नहीं, मफ़ाद का है—और मफ़ाद के आगे हर नारा ख़ामोश!
आखिर में असल सवाल अब भी वही है—क्या मुसलमान इस दायरे से निकलना चाहता है या नहीं?
अगर चाहता है, तो सिर्फ बयान, नारे और अस्थायी कदम काफी नहीं होंगे।एक वास्तविक बदलाव की जरूरत है—सोच में, व्यवस्था में और प्राथमिकताओं में।
वरना इतिहास यही लिखेगा:
"वह कौम जो सूद को हराम भी मानती थी, और उसी पर जीती भी थी!"
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