रविवार 19 अप्रैल 2026 - 19:15
हजरत अबू तालिब अ.स. का मर्तबा और फज़ीलत

हौज़ा / हज़रत अबू तालिब अ.स. मक्के में उनका रुतबा एक महान सरदार, न्याय करने वाले और एक दूरदर्शी लीडर का था। ख़ाना-ए-काबा की चाबियाँ संभालना और हाजियों को पानी पिलाने का सम्मानित पद उनके पास था। मक्का के लोग अपने फ़ैसले उनसे करवाते थे और उनकी बात को पत्थर की लकीर माना जाता था।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हज़रत अबू तालिब अ.स. मक्के में उनका रुतबा एक महान सरदार, न्याय करने वाले और एक दूरदर्शी लीडर का था। ख़ाना-ए-काबा की चाबियाँ संभालना और हाजियों को पानी पिलाने का सम्मानित पद उनके पास था। मक्का के लोग अपने फ़ैसले उनसे करवाते थे और उनकी बात को पत्थर की लकीर माना जाता था।

सवाल 1: सबसे पहले हमारे युवाओं को यह बताइए कि हज़रत अबू तालिब (अ.स.) कौन थे और मक्का के समाज में उनका क्या रुतबा था?

जवाब: हज़रत अबू तालिब (अ.स.)  का असल नाम 'इमरान' या 'अब्द-ए-मनाफ़' था। वह क़ुरैश के सरदार हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के बेटे, हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के सगे चचा, और हज़रत अली (अ.स.) के वालिद (पिता) थे। मक्का में उनका रुतबा एक महान सरदार, न्याय करने वाले और एक दूरदर्शी लीडर का था। ख़ाना-ए-काबा की चाबियाँ संभालना और हाजियों को पानी पिलाने का सम्मानित पद उनके पास था। मक्का के लोग अपने फ़ैसले उनसे करवाते थे और उनकी बात को पत्थर की लकीर माना जाता था।

सवाल 2: हमने अक्सर सुना है कि उन्होंने रसूलुल्लाह (स.अ.व.) की परवरिश की। यह परवरिश कैसी थी? क्या यह सिर्फ़ एक रस्म या मजबूरी थी?

जवाब: बिल्कुल नहीं! जब हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का दुनिया से जाने का समय होने लगा, तो उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद बेटे अबू तालिब (अ.स.) को बुलाकर अपने पोते मुहम्मद (स.अ.व.) की ज़िम्मेदारी सौंपी। हज़रत अबू तालिब (अ.स.) ने रसूलुल्लाह (स.अ.व.) को अपने सगे बच्चों से भी बढ़कर चाहा। उनकी पत्नी हज़रत फ़ातिमा बिन्त असद ने नबी (स.अ.व.) को एक सगी माँ से बढ़कर प्यार दिया। इतिहास गवाह है कि अबू तालिब (अ.स.) तब तक खाना शुरू नहीं करते थे, जब तक उनके भतीजे मुहम्मद (स.अ.व.) न आ जाएँ। वह जहाँ भी जाते, यहाँ तक कि सीरिया के व्यापारिक सफ़र पर भी, नबी (स.अ.व.) को हमेशा अपने साथ रखते थे।

सवाल 3: जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने नबूवत (इस्लाम) का ऐलान किया, तो पूरा मक्का उनका दुश्मन हो गया। उस मुश्किल वक़्त में हज़रत अबू तालिब का क्या किरदार था?

जवाब: यह वह जगह है जहाँ हज़रत अबू तालिब का किरदार एक लोहे की दीवार की तरह नज़र आता है। जब नबी (स.अ.व.) ने तौहीद (ईश्वर के एक होने) का ऐलान किया, तो मक्का के सभी बड़े सरदार (अबू जहल, अबू लहब, अबू सुफ़ियान आदि) दुश्मन हो गए। वे धमकियाँ लेकर अबू तालिब के पास आए कि अपने भतीजे को रोको या फिर हमसे जंग के लिए तैयार हो जाओ।अबू तालिब के लिए आसान था कि वे अपनी सरदारी बचाते, लेकिन उन्होंने क़ुरैश की परवाह नहीं की। उन्होंने नबी (स.अ.व.) से कहा: "मेरे भतीजे! जाओ और जो हक़ (सच) बात है वह कहो, ख़ुदा की क़सम जब तक अबू तालिब ज़िंदा है, मक्का का कोई भी व्यक्ति तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता।" इसी सुरक्षा की वजह से इस्लाम मक्का की गलियों में परवान चढ़ा।

सवाल 4: सर, 'शेब-ए-अबी तालिब' की घटना इतिहास का एक बहुत दर्दनाक हिस्सा है। युवा इसके बारे में जानना चाहते हैं कि वहाँ असल में क्या हुआ था?

जवाब: जब मक्का वालों ने देखा कि अबू तालिब किसी भी कीमत पर मुहम्मद (स.अ.व.) का साथ नहीं छोड़ रहे हैं, तो उन्होंने उनके पूरे खानदान (बनी हाशिम) का मुकम्मल सामाजिक और आर्थिक बायकॉट कर दिया। उन्होंने एक दस्तावेज़ लिखकर काबे पर लटका दिया कि कोई भी बनी हाशिम से लेन-देन या शादी-ब्याह नहीं करेगा।

मजबूरन हज़रत अबू तालिब अपने पूरे खानदान और नबी (स.अ.व.) को लेकर मक्का के पास दो पहाड़ों के बीच एक घाटी में चले गए, जिसे "शेब-ए-अबी तालिब" कहा जाता है। वहाँ उन्होंने तीन साल बेहद भूख और प्यास में गुज़ारे।
लेकिन अबू तालिब की नबी (स.अ.व.) से मोहब्बत का यह आलम था कि जब रात होती तो वह नबी (स.अ.व.) को उनके बिस्तर पर सुलाते, और जब सब सो जाते तो नबी (स.अ.व.) को वहाँ से उठाकर किसी और जगह सुला देते और उनकी जगह अपने बेटों (ख़ासकर हज़रत अली अ.स.) को सुला देते। ताकि अगर रात के अंधेरे में कोई दुश्मन हमला करे तो उनके बेटे अली (अ.स.) क़त्ल  हो जाए, लेकिन ख़ुदा का रसूल सुरक्षित रहे।

सवाल 5: युवाओं के ज़हन में एक सवाल अक्सर उलझन पैदा करता है कि कुछ लोग हज़रत अबू तालिब के ईमान (आस्था) को लेकर बहस करते हैं। आप इस पर क्या कहेंगे?

जवाब: यह एक बहुत अहम सवाल है। आज का युवा लॉजिक (तर्क) माँगता है। ज़रा अक़्ल से सोचिए: क्या यह मुमकिन है कि कोई व्यक्ति काफ़िर हो और वह तौहीद (इस्लाम) के सबसे बड़े प्रचारक के लिए अपना घर-बार, सरदारी और ख़ानदान सब कुछ क़ुर्बान कर दे?
1. उनके शेर (कविताएँ): हज़रत अबू तालिब की कविताओं का संग्रह "दीवान-ए-अबू तालिब" आज भी मौजूद है। इसमें ऐसे सैकड़ों शेर हैं जो नबी (स.अ.व.) के नबी होने और अल्लाह के एक होने की गवाही देते हैं।
2. नबी (स.अ.व.) का निकाह: हज़रत ख़दीजा के साथ नबी (स.अ.व.) का निकाह हज़रत अबू तालिब ने ही पढ़वाया था, और उस निकाह के ख़ुत्बे में उन्होंने अल्लाह की तारीफ़ और हज़रत इब्राहिम के दीन को माना था।
3. वफ़ादारी: जिसने अपना पूरा जीवन रसूल की हिफाज़त में गुज़ार दिया हो, उसके ईमान पर शक करना इतिहास और अक़्ल दोनों के साथ नाइंसाफ़ी है।
 

सवाल 6: जब हज़रत अबू तालिब का इंतकाल (निधन) हुआ, तो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) और इस्लाम पर इसका क्या असर पड़ा?

जवाब: हज़रत अबू तालिब की वफ़ात नबी (स.अ.व.) की ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख था। उसी साल हज़रत ख़दीजा का भी इंतकाल हुआ। नबी (स.अ.व.) इतने दुखी हुए कि उन्होंने उस पूरे साल को "आम-उल-हुज़्न" (यानी ग़म का साल) घोषित कर दिया।
अबू तालिब के जाने के बाद मक्का के दुश्मन बेख़ौफ़ हो गए। उन्होंने नबी (स.अ.व.) पर ज़ुल्म की इंतहा कर दी, रास्तों में काँटे बिछाए, पत्थर मारे। नौबत यहाँ तक आ गई कि नबी (स.अ.व.) को मक्का छोड़कर मदीना हिजरत (पलायन) करनी पड़ी, क्योंकि अब मक्का में उनके सबसे बड़े रक्षक 'अबू तालिब' मौजूद नहीं थे।

सवाल 7 (आख़िरी सवाल): सर, आज के इस दौर में, हज़रत अबू तालिब के जीवन से हमारे युवा क्या सबक सीख सकते हैं?

जवाब: हमारे युवाओं के लिए हज़रत अबू तालिब के जीवन में तीन बहुत बड़े सबक हैं:
1. हक़ (सच) का साथ देना: चाहे पूरी दुनिया आपके ख़िलाफ़ हो जाए, अगर आपका साथी हक़ पर है तो उसके साथ चट्टान बनकर खड़े हो जाएँ।
2. वफ़ादारी (Loyalty): रिश्तों और अपने उसूलों के साथ वफ़ादारी क्या होती है, यह अबू तालिब से सीखें।
3. परिवार का सपोर्ट (Family Support): आज के दौर में जब परिवार टूट रहे हैं, अबू तालिब हमें बताते हैं कि अपनों के लिए कैसा साया बनना चाहिए। वह सिर्फ एक सरदार नहीं, बल्कि एक बेहतरीन बाप, बेहतरीन चाचा और परिवार के महान रक्षक थे।

मेज़बान: बेशक! हज़रत अबू तालिब (अ.स.) इस्लाम का वह मज़बूत स्तंभ हैं, जिसकी बुनियाद पर आज इस्लाम की इमारत खड़ी है। सर, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कि आपने इस अहम विषय पर इतनी गहराई से रौशनी डाली। दर्शकों, उम्मीद है इस इंटरव्यू से आपको इतिहास के एक महान हीरो को समझने में मदद मिली होगी।

सवाल 8: सर, इतिहास में एक वाक़या बहुत मशहूर है जब मक्का वालों ने नबी (स.अ.व.) को दौलत, ताक़त और हुकूमत का लालच दिया था। उस घटना में हज़रत अबू तालिब का क्या रुख़ (रवैया) था?

जवाब: जी हाँ, यह एक बहुत अहम घटना है। जब क़ुरैश के सरदार नबी (स.अ.व.) को डरा नहीं सके, तो वे लालच लेकर हज़रत अबू तालिब के पास आए। उन्होंने कहा, "अपने भतीजे से कहिए कि अगर वह मक्का की हुकूमत चाहते हैं, तो हम उन्हें अपना बादशाह बना देंगे। दौलत चाहते हैं, तो हम खज़ाने जमा कर देंगे, बस वह बुतों का विरोध करना छोड़ दें।

अबू तालिब ने यह पैग़ाम नबी (स.अ.व.) तक पहुँचाया। तब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने वह तारीखी जुमला कहा था: "चाचा जान! अगर ये लोग मेरे दाएँ हाथ पर सूरज और बाएँ हाथ पर चाँद भी रख दें, तब भी मैं इस हक़ के रास्ते को नहीं छोड़ूंगा।"
यह सुनकर अबू तालिब ने ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। उन्होंने फौरन कहा: "मेरे भतीजे! तुम अपने मिशन पर क़ायम रहो। जब तक अबू तालिब ज़िंदा है, कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।" उन्होंने दौलत और ताक़त के सबसे बड़े ऑफर को अपने भतीजे के मिशन (इस्लाम) के लिए ठुकरा दिया।

सवाल 9: अक्सर हज़रत अली (अ.स.) का ज़िक्र तो होता है, लेकिन हज़रत अबू तालिब के दूसरे बच्चों का इस्लाम में क्या योगदान रहा? क्या उनका पूरा घर ही इस्लाम की सेवा में लगा था?

जवाब: बिल्कुल! हज़रत अबू तालिब का घर असल में इस्लाम का सबसे पहला 'डिफेंस सिस्टम' (रक्षा प्रणाली) था।
उनके एक बेटे हज़रत अली (अ.स.) थे, जिन्होंने नबी (स.अ.व.) के बिस्तर पर सोकर उनकी जान बचाई और इस्लाम के हर मोर्चे (जंग) में सबसे बड़े सिपाही बने।
उनके दूसरे बेटे हज़रत जाफ़र तय्यार (अ.स.) थे। जब मक्का में मुसलमानों पर ज़ुल्म बहुत बढ़ गया, तो नबी (स.अ.व.) ने मुसलमानों के एक समूह को हबशा (इथियोपिया) हिजरत करने को कहा। इस समूह के लीडर हज़रत जाफ़र थे। उन्होंने ही ईसाई राजा 'नजाशी' के दरबार में इस्लाम का ऐसा शानदार बचाव किया कि राजा भी रो पड़ा और उसने मुसलमानों को पनाह दी।यानी अबू तालिब के एक बेटे (अली) मक्का में रसूल (स.अ.व.) की हिफ़ाज़त कर रहे थे, और दूसरे बेटे (जाफ़र) विदेश में इस्लाम का बचाव कर रहे थे।

सवाल 10: हज़रत अबू तालिब एक बहुत बड़े सरदार और अमीर व्यापारी थे। लेकिन क्या उन्होंने इस्लाम के लिए कोई माली (आर्थिक) कुरबानी भी दी?

जवाब: यह एक ऐसा पहलू है जिस पर कम बात होती है। हज़रत ख़दीजा (स.अ.) की दौलत के साथ-साथ हज़रत अबू तालिब की दौलत भी इस्लाम के काम आई। जब "शेब-ए-अबी तालिब" (घाटी) में तीन साल का बायकॉट हुआ था, तब अबू तालिब ने अपनी सारी जमा-पूंजी और दौलत मुसलमानों को खाना खिलाने और उनके गुज़ारे पर खर्च कर दी। एक वक़्त मक्का के सबसे रईस सरदार होने के बावजूद, जब उनका इंतकाल हुआ तो उनके पास कोई दुनियावी दौलत नहीं बची थी। उन्होंने इस्लाम की ख़ातिर ग़रीबी और फाक़े (भूख) को बर्दाश्त किया।

सवाल 11: सर, नबी (स.अ.व.) अपने चाचा को उनके गुज़र जाने के बाद किस तरह याद करते थे?

जवाब: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के दिल में अपने चाचा के लिए बेइंतहा मोहब्बत और एहतराम (सम्मान) था। मैंने पहले ही बताया कि उन्होंने उनके इंतकाल के साल को "ग़म का साल" (आम-उल-हुज़्न) कहा।

बाद के सालों में भी, जब इस्लाम मदीना में ताक़तवर हो गया था, तब भी नबी (स.अ.व.) अक्सर मक्का के उन दिनों को याद करते थे। एक बार मदीना में मक्का वालों के ज़ुल्म का ज़िक्र हुआ, तो नबी (स.अ.व.) की आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने फरमाया (जिसका अर्थ है): "जब तक अबू तालिब ज़िंदा थे, क़ुरैश कभी मुझे वो नुकसान नहीं पहुँचा सके जो वो पहुँचाना चाहते थे।" नबी (स.अ.व.) ने कभी अपने चाचा की इस ढाल को फरामोश (भुलाया) नहीं किया।

सवाल 12 (आख़िरी सवाल): सर, आज के दौर में जब सोशल मीडिया पर हर तरह की जानकारी और ग़लतफ़हमियाँ मौजूद हैं, तो हमारे युवा इस्लाम के इन महान चेहरों के बारे में सही जानकारी कैसे हासिल करें?

जवाब: मेरा युवाओं को यही पैग़ाम है कि इतिहास को सिर्फ सुनी-सुनाई बातों (WhatsApp University) से मत पढ़ें।
1. रिसर्च करें: प्रामाणिक (Authentic) किताबें पढ़ें।
2. लॉजिक (तर्क) का इस्तेमाल करें: अगर कोई इतिहासकार किसी ऐसी हस्ती के बारे में नकारात्मक बात कहता है जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम और रसूल (स.अ.व.) की हिफ़ाज़त में लगा दी, तो वहाँ अपना दिमाग़ इस्तेमाल करें।
3. किरदार (Character) देखें: हज़रत अबू तालिब का किरदार वफ़ादारी, सच्चाई और बहादुरी का है। जो रसूल (स.अ.व.) से इतनी मोहब्बत करता हो, वह कभी हक़ के रास्ते से अलग नहीं हो सकता।

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