हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी (रह.) के शिक्षक हाज शेख़ अब्दुल्लाह मूसानी ने एक आध्यात्मिक घटना बयान की है जिसमें हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा (स.अ.) के मकाम और महानता और हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) की ज़ियारत की फ़ज़ीलत बयान की गई है।
उन्होंने बताया कि आयतुल्लाह मर'अशी नजफ़ी (रह.) ने तालिब-ए-इल्म से फ़रमाया कि उनके क़ुम आने की असल वजह एक आध्यात्मिक घटना थी, जो उनके वालिद सैयद महमूद मर'अशी नजफ़ी (रह.) के साथ पेश आई।
सैयद महमूद मरअशी नजफ़ी (रह.), जो इबादत और परहेज़गारी में मशहूर थे ने चालीस रातें हरम-ए-अमीरूल-मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) में इबादत में गुज़ारीं, ताकि हज़रत की ज़ियारत नसीब हो।
एक रात हाल-ए-मुकाशफ़ा में उन्होंने हज़रत अमीर-अल-मोमिनीन (अ.स.) की ज़ियारत की। हज़रत ने फ़रमाया:
सैयद महमूद! क्या चाहते हो?
उन्होंने अर्ज़ किया,मैं चाहता हूँ कि मुझे हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की क़ब्र मुबारक का मकाम मालूम हो, ताकि ज़ियारत कर सकूँ।
हज़रत अमीरूल-मोमिनीन (अ.स.) ने फ़रमाया: "मैं हज़रत फ़ातिमा (स.अ.) की वसीयत के ख़िलाफ़ उनकी क़ब्र ज़ाहिर नहीं कर सकता।
सैयद महमूद (रह.) ने अर्ज़ किया,फिर मैं ज़ियारत के लिए क्या करूँ?
हज़रत (अ.स.) ने फ़रमाया,अल्लाह तआला ने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) का जलाल और इज़्ज़त हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) को अता फ़रमाई है। जो शख़्स हज़रत ज़हेरा (स.अ.) की ज़ियारत का सवाब हासिल करना चाहे, वह क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) की ज़ियारत करे।
यह वाक़िया किताब "ज़ुलाल-ए-हिकमत; ज़िंदगी व सुलूक-ए-आयतुल्लाह मर'अशी नजफ़ी" (सफ़ा 92) में मौजूद है।
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