हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! इस्लाम के पवित्र महीने जिलहज्जा की नौवीं तारीख को यौम अरफ़ा (दिन अरफ़ा) कहा जाता है। यह दिन इस मायने में बेहद ख़ास है कि हज के दौरान लाखों हाजी मैदान-ए-अरफ़ात में मौजूद होते हैं, लेकिन इसकी बरकतें सिर्फ हाजियों तक ही सीमित नहीं हैं। शिया विचारधारा में इस दिन का रोज़ा रखना, दुआ करना और ईबादत करना बेहद फज़ीलत वाला अमल माना जाता है। लेकिन सबसे अहम चीज़ है "दुआ-ए-अरफ़ा" , जिसे आजिज़ी और इल्तिजा के अंदाज़ में पढ़ा जाता है।
दुआ-ए-अरफ़ा तीसरे इमाम, हज़रत इमाम हुसैन (अ) से मंसूब है। यह वही इमाम हैं जिनकी कुर्बानी ने इस्लाम की हिफाज़त की। ये दुआ सिर्फ एक दुआ नहीं, बल्कि मारफ़त, तौहीद और बंदगी का एक अद्भुत पाठ है।
मशहूर दुआओं की किताब "मफ़ातीहुल जिनान" में इस दुआ को बहुत एहतिमाम के साथ शामिल किया गया है। इसके अलावा, शेख अब्बास अल-क़ुम्मी ने अपनी तहरीर में इस दुआ को जगह दी। इमाम हुसैन (अ) ने खुद इसे अरफ़ात के मैदान में बेहद आजिज़ी और गिड़गिड़ाते हुए पढ़ा था, जैसा कि सय्यद इब्न ताऊस ने "इक़बालुल आमाल" में ज़िक्र किया है।
दुआ की रूहानी अहमियत
यह दुआ महज़ रस्मी अमल नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक उड़ान का एक बेहतरीन जरिया है। यह इंसान को बताती है कि वह अपने परवरदिगार के सामने कैसे सर झुकाए। इसके अल्फाज़ में खुदा की तारीफ और हमारी बेबसी का ऐसा सलीक़ा है जो रूह को भेद देता है। उलमा के अनुसार, यह दुआ इंसान के अह्लाक और समाजी ज़िम्मेदारियों को उजागर करती है। यह अहले बैत (अ) की वह तहे दिल से निकली हुई सदाक़त है जो हमें रूहानी हकीकत से रूबरू कराती है।
धार्मिक किताबों में रोज़े अरफ़ा और खास तौर पर इस दुआ के बारे में साफ़ ताकीद की गई है:
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रोज़े की तरगीब: हज़रत इमाम जाफर सादिक (अ) की रिवायत के मुताबिक, अरफ़ा का दिन “दुआ और गुज़ारिश करने का दिन” है। अगर कोई रोज़ा रख कर दुआ पढ़ता है तो यह पूरे साल के रोज़े के बराबर समझा जाएगा।
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रोज़े और दुआ के बीच फर्क: अरफ़ा की दुआ को इतनी अहमियत हासिल है कि शेख कफ़अमी जैसे बुजुर्गों ने अपनी किताब "अल-बलदुल अमीन" में लिखा है कि अगर किसी के लिए रोज़ा रखना दुआ पढ़ने में रुकावट बन रहा हो (जैसे कमज़ोरी लगना), तो उसे रोज़ा छोड़ कर इस दुआ की तिलावत पर ध्यान देना चाहिए।
दुआ-ए-अरफ़ा इस्लाम के उस रूहानी सरमाये की नुमाइंदा है जिसने तारीख की तमाम मुश्किलात को पार कर हम तक रौशनी पहुंचाई है। यह सिर्फ जुबान पर बल्कि दिल और दिमाग पर असर करने वाली चीज़ है। यह हमें सिखाती है कि हम एक पल के लिए भी अपने खुदा से ग़ाफिल न रहें। जैसा कि इमाम हुसैन (अ) ने फरमाया: "मैं अपनी बेबसी और ज़रूरत को लेकर तेरी तरफ आया हूँ।" यही गिड़गिड़ाहट ही बंदे और परवरदिगार के बीच करीबी की सबसे पक्की जंजीर है।
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