हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़मा जवादी आमोली ने अपने एक बयान में अरफ़ा के दिन की आध्यात्मिक महानता और अहले-बैत (अ) के सच्चे अनुयायियों के नैतिक चरित्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि धर्म के बुज़ुर्ग अरफ़ा के दिन अपनीे बजाय दूसरों, विशेष रूप से अहले-बैत (अ) के शियो के लिए दुआ किया करते थे।
उन्होंने फ़रमाया कि मरहूम शेख़ मुफ़ीद और दूसरे बड़े विद्वानों ने नक़्ल किया है कि कुछ बुज़ुर्ग साथी जब जबले-अरफ़ात से वापस लौटते थे, तो उनकी आँखें लगातार रोने के कारण लाल और अश्कबार होती थीं। जब उनसे पूछा जाता कि आप इतना क्यों रो रहे हैं जबकि परवरदिगार 'अरहमुर-राहिमीन' है, तो वह जवाब देते थे:
"हमने अपने लिए एक कतरा अश्क (आँसू) भी नहीं बहाया, बल्कि केवल अपने दोस्तों और अहले-बैत (अ) के शियो के लिए दुआ की है।"
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने कहा कि यह वास्तव में अहले-बैत (अ) की शिक्षाओं का प्रभाव था, क्योंकि रिवायतों में आया है कि जो व्यक्ति दूसरों की मुश्किल हल करे या उनके लिए दुआ करे, परवरदिगार-ए-मुतआल उसकी अपनी मुश्किलों को कई गुना अधिक आसान कर देता है।
उन्होंने मोमिनीन को नसीहत की कि अरफ़ा के दिन को केवल अपनी ज़रूरतों तक सीमित न रखें, बल्कि उम्मत-ए-मुस्लिमा, मज़लूमों, मोमिनों और मानवता की भलाई के लिए भी दुआ करें, क्योंकि ईसार और दूसरों के लिए ख़ैर-ख्वाही इस्लामी तालीम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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