हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर के तेहरान में दफ्तर में शहीद इमाम ख़ामेनेई की वैश्विक शख्सियत को खिराज-ए-तहसीन पेश करने की ग़रज़ से एक तक़रीब मुनअक़िद हुई जिस में बैनुलअक़वामी मुबल्लिग़ीन, ज़बान दानों और आलमी सतह पर सरगर्म शख्सियतों ने शिरकत की।
इस नशिस्त में हौज़ा ए इल्मिया ईरान के बैनुलअक़वामी उमूर के सरबराह हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद मुफ़ीद हुसैनी कोहसारी ने अपनी गुफ़्तगू के दौरान रहबर-ए-शहीद इंक़िलाब हज़रत आयतुल्लाह अल-उज़्मा इमाम ख़ामेनेई की बैनुलअक़वामी शख्सियत के मुख़्तलिफ पहलुओं का जाइज़ा पेश किया और उनकी फिक्री हिकमत-ए-तदबीरात की तशरीह की।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन हुसैनी कोहसारी ने अपने ख़िताब के आग़ाज़ में इमाम ज़माना (अज) और शोहदा की बारगाह में अक़ीदत का इज़हार करते हुए कहा: आज हम यहाँ जमा हुए हैं ताकि रहबर-ए-मोआज़्ज़म इंक़िलाब हज़रत आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के साथ अपने अहद की तज्दीद करें और ख़ुदावंद-ए-मुतआल, अंबिया, औलिया, शोहदा-ए-इंक़िलाब, मुक़ावमती मोहज़ के शोहदा, बैनुलअक़वामी मैदान के शोहदा और दुनिया भर के मुस्तज़'अफ़ीन से यह अहद करें कि हम अपने रहबर-ए-शहीद (रह) से किए गए अहद-ओ-पैमान पर साबित-क़दम रहेंगे ताकि दुनिया को उसके हक़ीक़ी मक़सद यानी अदल-ए-महदवी की आलमी हुकूमत तक पहुँचाया जा सके।
उन्होंने रहबर-ए-शहीद (रह) की शहादत के नब्बे दिन गुज़र जाने की तरफ इशारा करते हुए कहा: यह मामूली के दिन नहीं हैं बल्कि हमने "इंसानियत की एक शब-ए-क़द्र" को अपने पीछे छोड़ा है। हम एक फैसला-कुन मोड़ और तारीख़ी मरहले से गुज़र रहे हैं। हम ऐसे दौर के करीब पहुँच रहे हैं जो जम्हूरी-ए-इस्लामी ईरान के मुक़द्दस निज़ाम की ताक़त के इज़हार का दौर होगा। हम इसतिकबारी निज़ाम और उस की तसल्लुत-पसंद फ़ितरत को शिकस्त देने के मरहले में दाख़िल हो चुके हैं।
हौज़ा ए इल्मिया ईरान के बैनुलअक़वामी उमूर के सरबराह ने कहा: यह इज्तिमा'आत सिर्फ़ मुल्क के अंदर तक महदूद नहीं हैं बल्कि आज हम मुस्लिम उमम के जोश-ओ-ख़रोश का मुशाहिदा कर रहे हैं। यह बाशऊर और वफ़ादार मिल्लत जो गुज़िश्ता नब्बे रातों से सड़कों पर मौजूद है, रौशन मुस्तक़बिल की पैग़ामबर है।
उन्होंने इमाम-ए-शहीद के फिक्री पहलुओं की वज़ाहत करते हुए कहा: हमारे इमाम-ए-शहीद अगरचे ईरानियों में सबसे बढ़कर ईरानी थे और उन के गुफ़्तार-ओ-किरदार में ईरान से वाबस्तगी के सिवा कुछ नज़र नहीं आता था, लेकिन अज़ीम शख्सियतें जुग़राफ़ियाई सरहदों में महदूद नहीं होतीं। वह एक आलमी निगाह रखने वाली और उम्मत साज़ शख्सियत थे।
हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन हुसैनी कोहसारी ने अपनी गुफ़्तगू जारी रखते हुए रहबर-ए-शहीद इंक़िलाब की फिक्र के इस्ट्रेटेजिक पहलुओं का तज्ज़िया पेश किया और कहा: मैं आप मुबल्लिग़ीन को बिशारत देता हूँ कि हमारी रिवायात के मुताबिक ईरानी इस्लाम-ए-नाब की इन तालीमात को पूरी दुनिया में फैलाएंगे। रिवायात में मज़कूर "क़ौमी" से मुराद किसी मख़सूस जुग़राफ़िया के अफराद नहीं बल्कि वह लोग हैं जो हौज़ात-ए-इल्मिया के मकतब और इमाम खुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के अफकार में तर्बियत याफ्ता हैं और जिन्होंने इस अज़ीम इंक़िलाब को बरपा किया। यही वह अफराद हैं जो सह्यूनी हुकूमत की फितना अनगीज़ियों और तसल्लुत-पसंदाना इक़दामात का खातिमा करेंगे। यह भी उन इलाही वादों का हिस्सा है जिन की बिशारत रिवायात में दी गई है।
उन्होंने अमेरिका और इसराइल की तन्हाई की तरफ इशारा करते हुए कहा: मग़रिबी माद्दी तहज़ीब रुसवा हो चुकी है। अमेरिका से नफ़रत की लहर ख़ुद इस मुल्क के अंदर भी और यूरोप व लातीनी अमेरिका में तेज़ी से फैल रही है। सह्यूनी हुकूमत के ख़िलाफ़ नफ़रत भी एक आलमी तहरीक की सूरत इख़्तियार कर चुकी है। आज अमेरिका और इसराइल अपनी तारीख़ी तन्हाई के दौर से गुज़र रहे हैं और मुख़्तलिफ बुहरानों पर क़ाबू पाने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हैं।
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