अनुवाद एवं संकलन: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी |
अहले-बैत (अ) की विलादत और शहादत के दिन उनके चाहने वालों और अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। ये अवसर उन्हें अपनी श्रद्धा, प्रेम और निष्ठा को खुशी तथा शोक के माध्यम से व्यक्त करने का अवसर प्रदान करते हैं।
कुछ मासूम हस्तियों (अ) की विलादत या शहादत की सटीक और निश्चित तिथियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं रह सकीं। इसका कारण उस समय की राजनीतिक परिस्थितियाँ, तक़य्या तथा सामाजिक-सांस्कृतिक दबाव थे, जिनकी वजह से सभी विवरणों का खुले रूप से उल्लेख करना संभव नहीं था। फिर भी विभिन्न रिवायतों और ऐतिहासिक स्रोतों में उपलब्ध विवरणों के आधार पर इन तिथियों का निर्धारण किया जाता है।
उदाहरण के लिए, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शहादत की तिथि के संबंध में अनेक मत पाए जाते हैं। इनमें तीन प्रसिद्ध रिवायतें हैं, जबकि दो अन्य मत भी इतिहास में उल्लेखित हैं।
इसी प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं कि इमाम हसन मुज्तबा (अ) 50 हिजरी में 48 वर्ष की आयु में शाम (सीरिया) के शासक की योजना के तहत विष देकर शहीद किए गए। किंतु उनकी शहादत की तिथि को लेकर मतभेद है कि यह 7 सफ़र को हुई थी या 28 सफ़र को।
यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल से ही नजफ़ अशरफ़ और क़ुम मुक़द्दस में 7 सफ़र को इमाम हसन मुज्तबा (अ) की शहादत मनाई जाती रही है। उलेमा और मरजा-ए-इकराम की निगरानी में इस अवसर पर मजलिसे आयोजित होती हैं और मातमी जुलूस निकाले जाते हैं।
जहाँ तक इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत का संबंध है, इसके बारे में भी दो तिथियाँ वर्णित की गई हैं: 20 ज़िलहिज्जा और 7 सफ़र।
हालाँकि उपलब्ध रिवायतों से यह स्पष्ट होता है कि इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत के संबंध में वर्ष और स्थान का उल्लेख अधिक विश्वसनीय रूप में मिलता है, जबकि सटीक तिथि के विषय में मतभेद पाया जाता है।
अहमद बिन ख़ालिद बरक़ी ने अल-महासिन में, शैख़ कुलैनी ने अल-काफ़ी में, मुहम्मद बिन हसन सफ़्फ़ार ने बसाइरुद्दरजात में तथा अन्य कुछ स्रोतों में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से यह रिवायत बयान की है कि इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत हज के दिनों के बाद अबवा नामक स्थान पर हुई थी।
इमाम मूसा काज़िम (अ) का जन्म इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के हज से लौटते समय अबवा में हुआ। मुहम्मद बिन जरीर तबरी की एक रिवायत के अनुसार, इमाम हसन अस्करी (अ) से वर्णित है कि इमाम काज़िम (अ) की विलादत अबवा में, जो मक्का और मदीना के बीच स्थित है, ज़िलहिज्जा के महीने में हुई थी। जबकि कुछ अन्य स्रोतों में उनकी विलादत का दिन 7 सफ़र बताया गया है।
वे स्रोत और विद्वान जिनके अनुसार इमाम मूसा काज़िम (अ) की 7 सफ़र वाली विलादत की रिवायत कमज़ोर और अविश्वसनीय है, उनका मानना है कि यह तिथि ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल नहीं खाती।
शहीद अव्वल (र) और शैख़ मुहम्मद हसन नजफ़ी (र) के निकट इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत 7 सफ़र को होना अत्यंत असंभावित प्रतीत होता है।
जो बात स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है, वह यह है कि इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत अबवा में हुई थी, किंतु इसके लिए कोई निश्चित और सर्वसम्मत तिथि उपलब्ध नहीं है। यद्यपि कुछ रिवायतों में 7 सफ़र का उल्लेख मिलता है, लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों के अनुसार यह तिथि प्रबल नहीं प्रतीत होती।
उपलब्ध प्रामाणिक दस्तावेज़ों और ऐतिहासिक अनुमानों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इमाम मूसा काज़िम (अ) की विलादत 20 ज़िलहिज्जा को हुई थी। अतः उचित होगा कि इस दिन को उनके गुणों, श्रेष्ठ चरित्र, जीवन-आदर्शों और शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष महत्व दिया जाए।
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