जनता की सक्रिय उपस्थिति इस्लामी व्यवस्था और देश की सबसे बड़ी पूंजी है
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, ग़ज़्ज़ा और 12-दिवसीय युद्ध के शहीदों की पहली बरसी, साथ ही आयतुल्लाहिल उज़्मा मोहम्मद इस्हाक़ फ़य्याज़ की याद में आयोजित मजलिस ए ईसाले सवाब तथा 12-दिवसीय थोपे गए युद्ध के शहीदों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम शुक्रवार की शाम इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता की ओर से आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में उलेमा, मदरसों के शिक्षक एवं छात्र, अधिकारीगण और क़ुम के श्रद्धालु नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह आयोजन हरम-ए-हज़रत फ़ातिमा मासूमा में संपन्न हुआ।
इस अवसर पर नासिर रफ़ीई ने प्रतिरोध आंदोलन के शहीद कमांडरों की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने हालिया थोपे गए युद्ध और जंग-ए-सिफ़्फ़ीन के बीच गहरी समानताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमने 12-दिवसीय युद्ध में ऐसे कमांडरों को खोया है जिनकी शहादत सिफ़्फ़ीन के शहीदों से बहुत मिलती-जुलती है।
उन्होंने ऐतिहासिक स्रोतों का हवाला देते हुए कहा कि सिफ़्फ़ीन के युद्ध में इमाम अली ने अपने 63 वफ़ादार सेनानायकों और साथियों को खो दिया था। यह दुखद संख्या हमें हालिया युद्धों में अपने मूल्यवान कमांडरों की शहादत की याद दिलाती है।
शहीद के रक्त की पहली बूंद गिरते ही उसके गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं
क़ुम के इस धार्मिक विद्वान ने आगे एक रिवायत का उल्लेख करते हुए कहा कि अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने सिफ़्फ़ीन के शहीदों से फ़रमाया था: “तुमने कोई नुकसान नहीं उठाया, बल्कि हम रह गए हैं जो तुम्हारे बिछड़ने का ग़म सह रहे हैं।” आज हम भी अपने प्रिय शहीदों और शहीद कमांडरों से यही कहते हैं कि तुमने कोई घाटा नहीं उठाया; घाटा तो हमारा है कि हम तुम्हारे उच्च दर्जे पर रश्क करते हैं।
उन्होंने शहीदों के परिवारों और आम जनता को संबोधित करते हुए कहा कि शहीदों के लिए कोई दुख या शोक नहीं है, बल्कि लोगों को उनके उच्च आध्यात्मिक दर्जे पर रश्क करना चाहिए कि वे इतने महान मुक़ाम तक पहुँच गए हैं।
डॉ रफ़ीई ने कहा जनता आशूरा की संस्कृति से प्रेरित होकर दुश्मनों के सामने डटी हुई है। उन्होंने आगे कहा कि आज ईरान की जनता आशूरा की संस्कृति और शहीदों की शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर दुश्मनों के सामने मजबूती से खड़ी है, और यही जन-उपस्थिति इस्लामी व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन रफ़ीई ने मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा फ़य्याज़ के इल्मी और व्यक्तिगत गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अबुल क़ासिम अल-ख़ूई के प्रमुख शिष्यों में से थे और उन्होंने फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह पर अत्यंत गहन और प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं।
उन्होंने आगे कहा कि मरहूम आयतुल्लाहिल उज़्मा फ़य्याज़ का विलायत-ए-फ़क़ीह के विषय में व्यापक और स्पष्ट दृष्टिकोण था। उन्होंने इस्लामी शासन पर अरबी भाषा में एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अपने शोध के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ग़ैबत के दौर में विलायत-ए-फ़क़ीह के लिए किसी विशेष दलील की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह फ़िक़्ह के सामान्य सिद्धांतों और मूल नियमों का स्वाभाविक परिणाम है।
उन्होंने अंत में कहा कि उनके इल्मी कार्यों और धार्मिक शासन के क्षेत्र में उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण का राजनीतिक फ़िक़्ह के शोधकर्ताओं द्वारा और अधिक अध्ययन तथा विश्लेषण किया जाना चाहिए।
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