हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ में 19 जून को इमामबाड़ा ग़ुफ़रान मआब में अशरा-ए-मुहर्रम की तीसरी मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना कल्ब जवाद नक़वी ने शहीदाने कर्बला की महानता और महत्व को बयान किया। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) की अज़ा अल्लाह की निशानीयो में से है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह ने आदेश दिया है कि ऐ रसूल, अल्लाह के दिनों की याद दिलाइए। अल्लाह ने दिनों को याद करने का आदेश दिया है, लेकिन विशेष दिन तय करने के बजाय उनका मापदंड बताया है। क़ुरआन कहता है कि उन दिनों को याद किया जाए जो सब्र और शुक्र करने वालों के लिए सबक़-ए-इबरत हों। मौलाना ने कहा कि कर्बला से अधिक सब्र और शुक्र कहीं नहीं मिलता, इसलिए कर्बला की याद दरअसल अल्लाह के दिनों की याद है।

मौलाना ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में शहीद आयतुल्लाह खामेनेई की तस्वीरें हटाए जाने की निंदा करते हुए कहा कि कई जिलों से खबरें आ रही हैं कि पुलिस इन तस्वीरों को हटा रही है। पुलिस कह रही है कि ऊपर से आदेश आया है कि आयतुल्लाह खामेनेई की तस्वीरें न लगने दी जाएँ। मौलाना ने कहा कि आखिर यह आदेश ऊपर से किसने दिया? क्या ट्रंप और नेतन्याहू ने दिया है? भारत सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि भारत में मोदी और योगी की सरकार है या नेतन्याहू और ट्रंप की। अगर यहाँ मोदी और योगी की सरकार है तो फिर नेतन्याहू और ट्रंप के आदेश भारत में नहीं चलने चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि याद रखिए, शहीद से वही डरता है जो ज़ालिम होता है। उन्होंने कहा कि अब जहाँ भी तस्वीरें नहीं लगी हैं वहाँ उन्हें लगाया जाए। सभी सबीलों और घरों में तस्वीरें लगाई जाएँ। लोग मजलिसों और जुलूसों में शहीदों की तस्वीरों के साथ शामिल हों। यदि किसी सबील पर आपको शहीदों की तस्वीरें न दिखें तो समझ लीजिए कि वह मजलूम का समर्थक नहीं बल्कि ज़ालिमों का साथी है। क्योंकि आयतुल्लाह खामेनेई ने मजलूमों के लिए अपनी जान दी है। जो ज़ालिमों की मुख़ालफ़त और मजलूमों की मदद नहीं कर सकता, वह इमाम हुसैन (अ) का समर्थक नहीं हो सकता।


मौलाना ने कहा कि कुछ लोग मरे हुए यज़ीद पर तो लानत करते हैं, लेकिन ज़िंदा यज़ीद के पैर चूमते हैं, ऐसे लोग हुसैनी नहीं हो सकते।
उन्होंने आगे कहा कि बार-बार हमसे पूछा जाता है कि केवल ईरान ही अमेरिका से क्यों टकरा रहा है, जबकि अन्य मुस्लिम देश भी मौजूद हैं लेकिन वे अमेरिका और इस्राइल की गुलामी कर रहे हैं। याद रखिए, ईरान का अकेले ज़ालिम ताक़तों से टकराना यह साबित करता है कि जहाँ कर्बला और हुसैन (अ) की याद होती है वहाँ गुलामी की कोई जगह नहीं होती। कर्बला स्वतंत्रता का प्रतीक है। इमाम हुसैन (अ) का मानने वाला सिर कटा सकता है लेकिन सिर झुका नहीं सकता। आज देखिए, मजलूमियत की जीत हुई है और ज़ुल्म को हार का सामना करना पड़ा है।
मौलाना ने मजलिस के अंत में हज़रत जौन (अ) की शहादत बयान की।

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