हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,तबस के अहले-सुन्नत इमाम ए जुमआ ने इस महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया कि हम सभी को इमाम हुसैन (अ.स.) से बातिल के खिलाफ संघर्ष का सबक सीखना चाहिए और कहा कि इमाम हुसैन (अ.स.) का मकतब इस्लामी उम्मत के बीच हमेशा जारी और सारी रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अइम्मा-ए-अतहार अ.स.ने अपनी जानें खुदा की रजा के लिए कुर्बान कर दीं, इससे यह हुआ कि वे एक-एक रोशन चिराग की तरह पूरी दुनिया को नूर से भर गए और यहां तक कि गैर-मुस्लिम दुनिया ने भी इमाम हुसैन (अ.स.) की बहादुरी को स्वीकार किया है। इसका कारण यह है कि इमाम हुसैन अ.स. इस्लाम को खूँखार लोगों के चंगुल से बचाने में कामयाब रहे, जो पैगंबर (स.अ.व.) की शरियत से दूर हो गए थे।
अहले सुन्नत इमाम ए जुमआ ने इमाम हुसैन (अ.स.) की आशूरा क्रांति को जुल्म और कुफ्र के खिलाफ एक क्रांति बताया और याद दिलाया, इमाम हुसैन (अ.स.) पैगंबर-ए-अकरम (स.अ.व.) के मकतब के शिक्षित थे और जब उन्होंने देखा कि उनके दादा का धर्म खतरे में है, तो उन्होंने हिजरत का इरादा किया और अपनी पूरी जिंदगी और वजूद को धर्म और उसके मूल्यों की रक्षा के रास्ते में कुर्बान कर दिया।
मौलवी हुसैनी ने इस बात पर जोर दिया कि हज़रत हुसैन (अ.स.) से मुहब्बत उनके अनुयायियों और पैरोकारों के ईमान का हिस्सा है, क्योंकि रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.) ने इस बात पर विशेष जोर दिया है।
उन्होंने समाज में इमाम हुसैन (अ.स.) के मातम के निरंतरता और प्रभावकारिता के उपायों का संकेत देते हुए कहा,चूंकि सौभाग्य से सदियों से इमाम (अ.स.) की गतिविधि मुसलमानों के दिल और जान में बस गई है और उनके खून और दिल से घुल-मिल गई है, इसलिए निस्संदेह सभी मुसलमानों और सभी इस्लामी मज़हबों को इमाम हुसैन (अ.स.) और पैगंबर (स.अ.व.) के अहले-बैत को अपने ईमान का अभिन्न अंग मानना चाहिए।
उन्होने इमाम हुसैन (अ.स.) का मुख्य प्रयास अम्र बिल-मारूफ और नही अनिल-मुनकर को बढ़ावा देने की दिशा में था, याद दिलाया: साथ ही उस प्रेम, लगाव, जागरूकता और बसीरत को भी जारी रखा जाना चाहिए, जिसे इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों ने अपने खून से धर्म, न्याय और अम्र बिल-मारूफ व नही अनिल-मुनकर के पेड़ को सींचा।
मौलवी हुसैनी ने यह कहते हुए कि अम्र बिल-मारूफ के बिना समाज पतन की ओर चला जाता है, स्वीकार किया: जो निश्चित है वह यह है कि जब समाज में अम्र बिल-मारूफ और नही अनिल-मुनकर बंद हो जाए, तो निस्संदेह समाज में सभी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक खतरों की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और जिस समाज की संस्कृति पतित हो गई, उसका मतलब है कि वहाँ नही अनिल-मुनकर नहीं हुआ है।
उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कि हक हमेशा विजयी होता है, स्पष्टीकरण दिया इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने दादा की उम्मत के सुधार के लिए कदम उठाया और इसी रास्ते में शहीद हो गए, और सभी मुसलमानों के लिए यह अनिवार्य है कि वे उनके रास्ते को जारी रखें।
अंत में मौलवी हुसैनी ने इस बात का संकेत देते हुए कि सभी इस्लामी देशों में अहले-सुन्नत मुहर्रम के दिनों में कुरान पढ़ने और खत्म करने में लगे रहते हैं, याद दिलाया: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी को इमाम हुसैन अ.स. और उनके साथियों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
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