शुक्रवार 26 जून 2026 - 18:08
ग्यारह मुहर्रम 61 हिजरी: पैग़म्बर के अहले-बैत पर होने वाले अत्याचारों के नए अध्याय का आरंभ

61 हिजरी का ग्यारह मुहर्रम इस्लामिक इतिहास का वह अत्यंत दुखद दिन है जब आशूरा की घटना के बाद पैग़म्बर के अहले-बैत पर होने वाले अत्याचारों का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

लेख: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, 61 हिजरी का ग्यारह मुहर्रम इतिहास का अत्यंत दुखद दिन है, जब कर्बला की घटना के बाद अहले-बैत पर अत्याचारों का नया सिलसिला शुरू हुआ।

दस मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके वफादार साथियों की महान शहादत के बाद, ग्यारह मुहर्रम को उमर इब्न साद की सेना ने कर्बला के शहीदों के पवित्र शरीरों के साथ अपमान किया और अहले-बैत को बंदी बनाकर कर्बला से कूफ़ा की ओर ले जाया गया। इसी दिन से हज़रत ज़ैनब और इमाम ज़ैनुल आबेदीन के नेतृत्व में कर्बला के संदेश के प्रचार का महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ।

शहीदों के पार्थिव शरीरो का अपमान

आशूरा के बाद उमर इब्न साद ग्यारह मुहर्रम को दोपहर तक कर्बला के मैदान में रुका रहा। उसने पहले अपने मारे गए सैनिकों को दफनाया, लेकिन इमाम हुसैन, अहले-बैत और अन्य शहीदों के पवित्र शवों को बिना कफ़न रेगिस्तान में छोड़ दिया। यह मानव इतिहास के सबसे दर्दनाक अत्याचारों में से एक माना जाता है।

इसके बाद उसने आदेश दिया कि इमाम हुसैन और अन्य शहीदों के सिर शरीर से अलग करके उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद के पास भेजे जाएँ। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार लगभग 72 पवित्र सिर विभिन्न कबीलों में बाँटे गए ताकि उन्हें कूफ़ा ले जाया जा सके।

कुछ स्रोतों के अनुसार इन सिरों का वितरण इस प्रकार था: क़बीला क़िन्दा को 13, हवाज़िन को 12, तमीम को 17, बनी असद को 9, मज़हज को 7 और अन्य कबीलों को 13 सिर दिए गए।

अहले-बैत के कैदीयो का काफ़िला कर्बला से रवाना

ग्यारह मुहर्रम की दोपहर पैग़म्बर के अहले-बैत की महिलाओं और बच्चों को ऊँटों पर बिठाकर कूफ़ा की ओर ले जाया गया। इमाम ज़ैनुल आबेदीन गंभीर बीमारी के बावजूद इस काफ़िले के साथ चले।

जब काफ़िला कर्बला से गुज़रा और शहीदों के बे-सिर और रक्तरंजित शवों को देखा गया तो सभी पर गहरे दुख का पहाड़ टूट पड़ा। हर तरफ रोने-धोने का माहौल था, लेकिन इन कठिन क्षणों में हज़रत ज़ैनब ने अत्यंत धैर्य और अल्लाह पर भरोसे के साथ सबको हिम्मत दी।

रिवायत के अनुसार उन्होंने इमाम हुसैन के शरीर को देखकर दर्द भरे शब्दों में कहा: “मैं उस पर कुर्बान जाऊँ जिसका सब कुछ लूट लिया गया, मैं उस पर कुर्बान जाऊँ जिसके तंबू उखाड़ दिए गए, मैं उस पर कुर्बान जाऊँ जो न मुसाफ़िर है कि वापसी की उम्मीद हो और न घायल है कि ठीक होने की उम्मीद हो, मैं उस पर कुर्बान जाऊँ जिसे प्यासा और शहीद किया गया और जिसका चेहरा खून से तर था।”

फिर उन्होंने अल्लाह से दुआ की: “अल्लाहुम्मा तक़ब्बल मिन्ना हाज़ा अल-क़ुर्बान” यानी हे अल्लाह! हमारी इस महान कुर्बानी को स्वीकार कर।

यह दुआ हज़रत ज़ैनब के धैर्य, संतोष और अल्लाह पर पूर्ण भरोसे का प्रमाण है।

अहले-बैत के कैदीयो में शामिल महिलाएँ और बच्चे

ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार कर्बला के बंदियों में कई महान महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, जैसे हज़रत ज़ैनब, हज़रत उम्म कुलसूम, हज़रत फातिमा बिन्त अली, हज़रत फातिमा बिन्त हुसैन, हज़रत सकीना, हज़रत रबाब और हज़रत उम्म इसहाक आदि।

इन्हें अत्यंत अपमानजनक स्थिति में बंदी बनाकर कूफ़ा ले जाया गया।

इब्न ज़ियाद के दरबार में अपमान

कूफ़ा में शहीदों के पवित्र सिर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद के दरबार में पेश किए गए। उसने इमाम हुसैन के सिर का अपमान किया और उसकी छड़ी से बेअदबी की।

यह देखकर सहाबी ज़ैद इब्न अरक़म अत्यंत दुखी होकर बोले: “अपनी छड़ी इन होंठों से हटा लो, मैं ने रसूलुल्लाह को इन्हीं होंठों को चूमते देखा है।”

इसके बाद इब्न ज़ियाद ने उन्हें डाँटा और अपमानित किया, जिसके बाद वे रोते हुए दरबार से बाहर चले गए।

ग्यारह मुहर्रम का संदेश

ग्यारह मुहर्रम केवल कैद की शुरुआत नहीं, बल्कि सत्य के संदेश की एक नई यात्रा का आरंभ है। आशूरा ने यदि अल्लाह के रास्ते में बलिदान का पाठ दिया, तो ग्यारह मुहर्रम ने दिखाया कि अहले-बैत ने कैद और अत्याचार के बावजूद सत्य की आवाज़ को कभी शांत नहीं होने दिया।

हज़रत ज़ैनब और इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने अपने ऐतिहासिक भाषणों से यज़ीदी अत्याचार को उजागर किया और कर्बला के संदेश को हमेशा के लिए जीवित कर दिया।

इस प्रकार ग्यारह मुहर्रम इस्लामी इतिहास का एक अत्यंत दुखद लेकिन गौरवपूर्ण दिन है, जो अहले-बैत के धैर्य, दृढ़ता, अल्लाह पर भरोसे और सत्य के लिए दी गई महान कुर्बानी को हमेशा याद दिलाता रहेगा।

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