सोमवार 29 जून 2026 - 13:07
कर्बला के बाद हज़रत ज़ैनब (स) का किरदार

कर्बला में इमाम हुसैन (अ) ने अपने खून से इस्लाम को जीवन दिया और शाम में हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने ख़ुत्बों के माध्यम से उस जीवन को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

लेखक: शब्बीर अली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | कर्बला में इमाम हुसैन (अ) ने अपने खून से इस्लाम को जीवन दिया और शाम में हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने ख़ुत्बो के माध्यम से उस जीवन को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

आम तौर पर लोग समझते हैं कि कर्बला की घटना 10 मुहर्रम को समाप्त हो गई, लेकिन वास्तविकता यह है कि आशूरा केवल एक चरण था। यदि कर्बला युद्धभूमि थी तो कूफ़ा और शाम तबलीग़ के मैदान थे। यदि इमाम हुसैन (अ) ने तलवार और बलिदान से धर्म की रक्षा की, तो हज़रत ज़ैनब (स) ने अपने धैर्य, दूरदर्शिता और अद्वितीय भाषणों के माध्यम से इस बलिदान के उद्देश्य को दुनिया के सामने उजागर किया।

आशूरा के बाद दुश्मन यह समझ बैठे थे कि हुसैन (अ) को शहीद करके सत्य की आवाज़ हमेशा के लिए शांत कर दी गई है, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि हुसैन की बहन जीवित है। वह बहन जिसके हृदय में अली (अ) की शुजा’त, फ़ातिमा (स) की पवित्रता और रसूल-ए-ख़ुदा (स) की हिकमत समाई हुई थी।

जब अहले-बैत के क़ैदियों के काफ़िले को कूफ़ा में प्रवेश कराया गया, तो लोग तमाशा देखने के लिए इकट्ठा हो गए। बहुत से लोग वास्तविकता से अनजान थे। ऐसे में हज़रत ज़ैनब (स) ने वह ऐतिहासिक भाषण दिया जिसने कूफ़ा के जमीर को झकझोर दिया। आपने कहा: “ऐ कूफ़ा वालों! क्या तुम रो रहे हो? तुम्हारे आँसू कभी सूखें नहीं, क्योंकि तुमने ही हुसैन (अ) को बुलाया और फिर उन्हें अकेला छोड़ दिया।” इन शब्दों ने लोगों के दिलों में पश्चाताप की आग जला दी।

इसके बाद जब क़ैदियों के काफ़िले को शाम में यज़ीद के दरबार में पेश किया गया, तो यज़ीद अपनी बाहरी जीत पर खुश था। उसे लगा कि आज आले-मुहम्मद (अ) को अपमानित कर दिया गया है, लेकिन हज़रत ज़ैनब (स) ने यज़ीद के दरबार को न्याय की अदालत बना दिया। आपने निर्भीक होकर कहा:

“फकिद कैदक, वास‘ सईक, व नासिब जुहदक, फ़वल्लाहे ला तमहु ज़िक्रना, व ला तमीतु वह्यना...”

अर्थात: “ऐ यज़ीद! जो भी चालें चलनी हैं चला ले, अपनी पूरी कोशिश कर ले, अल्लाह की क़सम! न तो तू हमारे नाम को मिटा सकेगा और न ही वह्य (इलाही संदेश) के नूर को बुझा सकेगा।”

यह केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि अत्याचार के सिंहासन के सामने सत्य की उद्घोषणा थी। यज़ीद के दरबार में एक बे-सहारा महिला ने ऐसी हुंकार भरी कि विजेता पराजित हो गया और बंदी इतिहास के विजेता बन गए।

हज़रत ज़ैनब (स) ने साबित किया कि मीडिया और प्रचार किसी भी आंदोलन की आत्मा होते हैं। यदि कर्बला का संदेश लोगों तक न पहुँचता, तो शायद यज़ीद की सत्ता अपने अत्याचार को सफलता का नाम दे देती, लेकिन हज़रत ज़ैनब (स) और इमाम सज्जाद (अ) ने अपने भाषणों के माध्यम से दुनिया को बता दिया कि कौन क़ातिल था और कौन मक़्तूल, कौन ज़ालिम था और कौन मज़लूम। इसी प्रचार ने यज़ीद की झूठी जीत को हार में बदल दिया।

आज के समय में भी हज़रत ज़ैनब (स) का किरदार हमें यह शिक्षा देता है कि सत्य का समर्थन केवल युद्धभूमि में ही नहीं होता, बल्कि कलम, भाषा, मीडिया, मंच, शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से भी होता है। यदि असत्य अपने प्रचार से लोगों को गुमराह करता है, तो सत्य के पक्षधर लोगों पर आवश्यक है कि वे ज़ैनबी तरीके से सच्चाई को दुनिया तक पहुँचाएँ।

निष्कर्ष

कर्बला हमें बलिदान सिखाती है, और हज़रत ज़ैनब (स) हमें उस बलिदान का संदेश पहुँचाना सिखाती हैं। हुसैन (अ) ने अपना खून दिया ताकि इस्लाम जीवित रहे, और ज़ैनब (स) ने अपनी ज़बान दी ताकि इस्लाम पहचाना जाए। इसी कारण आज भी दुनिया कहती है: “कर्बला में हुसैन (अ) ने अपने खून से इस्लाम को बचाया, और शाम में ज़ैनब (स) ने अपने भाषणों से इस्लाम को हमेशा के लिए जीवित रखा।”

सलाम हो आप पर ऐ ज़ैनब-ए-कुबरा, ऐ कर्बला की सहभागी, ऐ कर्बला की वीरांगना।

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