हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्तित्व समय के पन्नों पर केवल स्याही से नहीं बल्कि अपने दिल के खून, विचारों की गहराई और कलम की रोशनी से लिखे जाते हैं। ऐसे लोग केवल व्यक्ति नहीं होते, बल्कि एक युग, एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक जीवित इतिहास होते हैं। जब ऐसी हस्तियाँ दुनिया से जाती हैं तो केवल एक दिल नहीं रोता, केवल एक शहर नहीं उजड़ता, बल्कि ज्ञान की बस्ती सूनी हो जाती है, साहित्य की महफ़िल उदास हो जाती है, शोध का दीपक काँपने लगता है और उम्मत का आकाश धुंधला हो जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि सय्यद सलमान हुसैनी नदवी का निधन भी ऐसा ही गहरा और दुखद हादसा है। यह केवल एक आलिम की मृत्यु नहीं, बल्कि विचार के एक स्तंभ का गिरना, शोध के एक समुद्र की शांति का टूटना, साहित्य के एक बाग का उजड़ना और दावत व विचार के एक सूरज का डूब जाना है। उनके निधन से इस्लामी समुदाय एक ऐसे अनमोल हीरे से वंचित हो गया है जिसका कोई आसान विकल्प नहीं मिल सकता।
मौलाना एजाज़ क़ायमी ने कहा कि वह ज्ञान के अमीन, कलम के रक्षक, विचार के संरक्षक, साहित्य के महारथी, शोध के निर्माता और इतिहास के जानकार थे। उनके कलम से निकला हर शब्द तर्क का दीपक, हर वाक्य ज्ञान की कुंजी, हर पंक्ति समझ की झलक और हर किताब ज्ञान का प्रकाश स्तंभ लगती थी। उन्होंने केवल किताबें नहीं लिखीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के दिमाग को रोशनी दी, दिलों को जागृत किया और विचारों को दिशा दी।
उन्होंने कहा कि दिवंगत सैकड़ों पुस्तकों के लेखक थे, लेकिन उनकी असली महानता केवल लेखन की संख्या नहीं, बल्कि शोध की गहराई, तर्क की मजबूती, शैली की सुंदरता और विचार की व्यापकता थी। जब उनका लेखन इतिहास पर होता तो अतीत बोल उठता, जब सीरत पर होता तो किरदार चमक उठते, जब संस्कृति पर चर्चा होती तो सभ्यता के द्वार खुल जाते और जब उम्मत के मुद्दों पर बात करते तो दिल और दिमाग दोनों रोशन हो जाते।
सय्यद सलमान नदवी का साहित्यिक स्थान भी अत्यंत उच्च था। वह शब्दों के निर्माता, अभिव्यक्ति के कलाकार, लेखन के जादूगर और शैली के महारथी थे। उनकी भाषा में स्पष्टता की खुशबू, सुंदरता की मिठास, शालीनता की कोमलता और अर्थ की गहराई एक साथ मिलती थी। उनकी लेखनी इतनी प्रवाहमय थी कि पाठक शुरू से अंत तक पढ़ते चले जाते थे।
वह एक शोधकर्ता भी थे, विचारक भी, इतिहासकार भी और सुधारक भी। उनकी शख्सियत ज्ञान, साहित्य, शोध, दावत, विचार और समझ का सुंदर संगम थी। उन्होंने पुराने ज्ञान भंडार को आधुनिक सोच तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।
उन्होंने अहले-बैत से उनकी मोहब्बत का उल्लेख करते हुए कहा कि अहले-बैत से उनका प्रेम उनकी शख्सियत का एक उजला पहलू था। मतभेदों के बावजूद उन्होंने अहले-बैत के सम्मान को हमेशा बनाए रखा। वे मोहब्बत को एकता का पुल, प्रेम को उम्मत की पूँजी और अहले रसूल से जुड़ाव को ईमान की सुंदरता मानते थे।
उन्होंने आगे कहा कि उनकी ज़िंदगी एक छायादार वृक्ष की तरह थी, जिसकी छाया में ज्ञान को सुकून मिला, शोध को ताकत मिली, साहित्य को ताजगी मिली और विचार को विस्तार मिला। अब वह वृक्ष अपनी भौतिक उपस्थिति से तो नहीं है, लेकिन उसके फल आज भी ज्ञान प्यासों की प्यास बुझा रहे हैं। ऐसे लोग मरकर भी नहीं मरते; उनकी किताबें उनकी सांस बन जाती हैं, उनके विचार उनकी आवाज बन जाते हैं, उनके शिष्य उनकी यादगार बन जाते हैं और उनके वैज्ञानिक कार्य उनकी अमरता का प्रमाण देते रहते हैं।
मौलाना एजाज़ क़ायमी ने कहा कि आज जब हम सैयद सलमान हुसैनी नदवी के निधन पर दुखी हैं, तो वास्तव में हम उस युग के अंत पर शोक मना रहे हैं जिसमें कलम इबादत थी, शोध अमानत था, साहित्य शालीनता थी और मतभेद भी शिष्टाचार के दायरे में रहते थे। उनकी खामोशी हमें यह संदेश देती है कि व्यक्ति चले जाते हैं लेकिन विचार बाकी रहते हैं, दीपक बुझ जाते हैं लेकिन रोशनी जारी रहती है, कारवां बिछड़ जाते हैं लेकिन मंज़िलें बनी रहती हैं।
उन्होंने दिवंगत के लिए दुआ करते हुए कहा कि अल्लाह तआला उन्हें पूर्ण रूप से माफ़ फरमाए, उनके दर्जे बुलंद करे, उनकी वैज्ञानिक सेवाओं को सदक़ा-ए-जारिया बनाए, उनकी गलतियों को माफ़ करे और उन्हें अपने करीबी बंदों, नबियों, सच्चों, शहीदों और नेक लोगों के साथ शामिल करे। दुआ है कि उनके कलम की रोशनी क़यामत तक ज्ञान वालों के दिलों में उजाला फैलाती रहे और उनका नाम हमेशा ज्ञान के आकाश पर चमकता रहे।
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